कविता बथौं जनि
दिखेन्दी नि,
बस मैसूस होन्दि
कब्बी ठंडी सुरसुर्या
कब्बी टटगार ह्यूं साड़
कब्बी ताति तौळाबोळ लू,
फेर
शब्द पकड़दी
कागज मा बिखदरी
कैका हिया बैठदी
कैका हिया उठदी
अर, कै उणि बल
माळा गोरू धौळे-धौळ।
धर्ती पर जीवन संघर्षों वास्ता च, आराम त यख बटिन जाणा बाद, ना चै किन बी कन पड़ल, ये वास्ता लग्यां रावा, जत्गा देह घिस्येली उत्गा चमक, उत्गा संचय जु यख छुटलू। @ बलबीर राणा 'अडिग'
कविता बथौं जनि
दिखेन्दी नि,
बस मैसूस होन्दि
कब्बी ठंडी सुरसुर्या
कब्बी टटगार ह्यूं साड़
कब्बी ताति तौळाबोळ लू,
फेर
शब्द पकड़दी
कागज मा बिखदरी
कैका हिया बैठदी
कैका हिया उठदी
अर, कै उणि बल
माळा गोरू धौळे-धौळ।
बादळ हरामी साला, धौळा-धौळा काळा-काळा,
काल बणि औणा बोला, फटणा फटाक चा।
होणु-खाणु घर-बार, मिलट मा वार-पार,
डुकरदा रोला-गाड़, कना सफाचट चा।
सर्ग बण्यूं भौंकाल, डौरौ नौ बसग्याळ,
जान ऐगे गाळ-गाळ, कनु कलो-काल चा।
जंत जोड़ जौंतैं पाळि, दबेणि सु गाजी साळी,
हैंसदि जिंदगी होंणि, पल मा मड़ान चा।
हिलणि पाड़ै कि जड़, भर्र-भर्र धड़-धड़
सड़क्यूँ कि चीरफाड़, कनि या बरखा चा
विकास बिणास होंणू, पाड़ रुणू दणमण,
राजी-बाजी घौर-कूड़ि, होणी खंद्वार चा।
ब्वेकु बौं हाथन पाँचेक सालै श्रेया कु बस्ता छौ कांधिम थाम्यूं अर देणा हाथन वींकि हथगुळि पकड़ी नौन्याळां तै भिड़कतौळ मा छै वींतैं अग्नै खेंचणि, अर स्या खुनखुन करि पिछनै छै ताण मारणी। वींकु हैंका तरिफां ताण मन्नो कारण छौ इस्कोला गेटा बौं तरिफां बाळों कि चटण-बटण वळि दुकनि।
चुप्प रा गौ खड्यौण्यां, चल अग्नै ? मैने तेरो को फुंड चुट्याणा आज।
वीन खुन्न-खुनाट दगड़ बोलि "अपणि बाबै ....... होगी तू " मुझे चौकलेट नै लाणै देती है। ब्वेल चट्टाक वींका गिच्चा पर। कैसी गळद्यवा लड़की है ये ? पता नै काँ-काँ से सीखती है ऐसी भद्दी गाळयां। यां सैर-बजार में रै कर तमीज बि नै सीख रयी। जनु कि सैर-बजार होन्दू ही तमीजा वास्ता होलू।
चल घर, तेरे पापा को तेरी सिखैत करूंगी आज।
ऊँऽऽ..हुँ...हुँ, हाँ…. कल देणा, उस पापा ने ही दिले थे मुझे पांच लुप्या, ऊँऽऽ हुँ.. हुँ ।
अच्छा त सु कमिना बिगाड़ रा मेरी श्रेया को, बतौन्दि वेतैं आज ।
‘जन मयेड़ि तनि जयेड़ि’ श्रेया कख चुप्प रौण वळि छै। वीन बि टप्प उनि खुन-खुनाट दगड़ ऊँऽऽ..ऊँऽ... मैने बि बता देणा कि पापा ये मम्मी तुझे कमिना बोल रयी थी अर ब्याळि बगल वाले अंकल को "अपणि मयेड़ी ख....." बोल रयी थी।
मि वूंका पिछने-पिछने छौ औणू तै पतळी गळि मा। तौंकि विशुद्ध लोकवाणि वार्ता सूणि मितैं खित्त हैंसि ऐन अर मि तौं तैं बिरै अग्नै सरक्यूं। मेरा अग्नै सरकण पर स्या भुलि गुणमणाट मा छै बौन्नी, आँ ऐसे हंसणें वाले तो देते हैं बच्चों को कुशिक्षा।
@ बलबीर राणा 'अडिग'
सबसि पैलि त ‘खोळी का गणेश’ फिलमै सर्री टीम तैं बधै अर शुभकामना देन्दू कि आपक श्रम साध्यन एक भलि फिल्म गढ़वळि सिनेमा मा दीनि। भौत सालों बिटे एक भलि फिलम द्योखणू मिली। अजक्याल या फिलम राज्य अर देसै राजधानी दगड़ हौरि जगा बि खूब चर्चा मा छ। फिलमों मतलब केवल मनोरंजन ना बल्कि सिनेमा चरित्र का अनुरूप चारित्रिक गुणों मा सबल अर अब्बल होण होंद, अर इना गुण यीं फिलम मा लोग देखणा। विशेषकर कथा विषै अर निर्देशन। पटकथा एक ज्वलंत सामजिक विषै पर छ अर डारेक्शन मा धीर र्धिघम यानि परिपक्वता छ। फिलम ब्वाला त घरजवैं, चक्रचाळ, बंटवारू, औंसी कि रात, जना भलि गढ़वळि फिलमौं का दगड़ छ। यनु पुळबैं केवल मि ही ना बल्कि कतिगा देखदारों का मुख सि सुणेणू। एक-एक करि फिल्म का सब्बी पक्षों कि छाळ-छांट कने कोसिस कनू। उन मि एक कवि अर कथाकार छौं फिल्म समिक्षक ना, फिर कोसिस कनू।
पैलि बात - या बात केवल ‘खोळी का गणेश’ फिलम ना बल्कि पूरा गढ़वळि सिनेमा जगत का वास्ता छ। त यीं बात पर मि फिलम का टैटल पर औन्दू, फिलम को टैटल छ ‘खोली का गणेश’ मि आप अर आम गढ़वळि लोक उच्चारण कनू ‘खोळी का गणेश’। त ‘ल’ अर ‘ळ’ द्वी शब्दों कि छाळ-छांट इनि चा कि हमारि गढ़वळि मा द्वीयूं अर्थ अलैद होंद। गढ़वळि मा ‘ल’ कि जगा पर य उक्षिप्त परिवेष्टित ‘ळ’ को प्रयोग होंद। यांकि पूरी व्याख्या कन यख गलत ह्वे जाली। मोटु-माटी देखा त अगर हम ‘ळ’ कि जगा ‘ल’ ल्यौखला त हमरि गढ़वळि मा शब्दों कु अर्थ बिल्कुल बदलि जांद। जनु कि ‘खाल’ मतलब चमड़ा, अर ‘खाळ’ मतलब तलौ या तालाब, ‘छाला कु मतलब नदी या गदेरौ कु किनारा, अर छाळा कु मतलब फफोला या छाले’। मोल - कीमत, अर मोळ - गौबर। यनु उच्चारण विभेद ‘ण’ का जगा ‘न’ मा बि दिखदो, जनु कि विणाश - विनाश, कठिण - कठिन, पाणी तैं पानी इत्यादी। त माराज अपणि पीढ़ी का वास्ता भाषा कु सही उच्चारण रूप अर उपयोग पौंछाण साहित्य अर संस्कृति वर्ग का का सब्बी लोगों कि जिम्मेदरि होन्दि, कोसिस चयेंद कि लोक की असली पछयाण बची रावो।
अब इखमु देखा कि अगर क्वी एक्टर व्यवहारिक रूप से गढ़वळि नि बच्यान्दो अर जब वेतैं हम स्क्रिप्ट मा यनु लेखि द्याला त सु संवाद ‘ल’ जनु करलो ज्यां सि वेकु उच्चारण गलत होलू, अर भाषा बनौटी अर थर्पीं जन लगलि, बिल्कुल रोबोटिक। इलै वे कलाकार तैं बिंगांण पड़लो कि भै साब, मेला कु मतलब बीज होन्दू अर मेळा कु कौथिग। जनु कि चला भै म्यौळा जंयोला आज। यख बि ‘खोली’ कु मतलब खोलण यानि खोलना होणू। जनु कि, खोली दे माता खोल भवानी धारै मा किवाड़ा (एक लोक गीत)। ये कारण ‘ळ’ पर बात रखण जरूरी समझी।
या बात आज ना बल्कि गढ़वळि सिनेमा का उत्रार्ध बिटे देखणू मिलद। भाषा सही लिखे जावो अर सही उच्चारित हो या जिम्मेवारी फिल्म संबन्धित सब्बी किरदारों कि होन्दि। स्क्रिप्ट राईटर, डारेक्टर, एक्टर अर मददगारी, यामा सब्बी सामिल छन। यीं बात तैं मि केवल यीं फिलम का बाबत नि बल्कि आज पूरा गढ़वळि सिनेमा जगत का परिप्रेक्ष्य मा बोन्नू। अगर हम भाषा संस्कृति बचाणैं बात कना त यखमु या बात झूटि ह्वे जाणि, अगर केवल मनोरंजन अर अपणू व्यवसाय देखण त फेर बात अलैद छ। भाषा बाबत हौरि कारकों का अलौ सबसि बड़ौ कारक मितैं जु दिखद वा छ हिन्दी का चश्मा से गढ़वळि ल्यौखण अर बोन्न। आशा च मेरि यीं बात तैं फिल्मकार अन्यथा नि ल्हेल्या अर अग्नै अपणि भाषा वास्ता सुधारौ बाटू द्यखला।
दूसरी बात - कि ‘खोळी का गणेश’ एक सफल फिलम (फिल्म का जगा ‘फिलम’ गढ़वळि उच्चारण) छ। क्वी बि फिलम भलि या खराब फिलम निर्माता, निर्देशक, कलाकारों या हौरि सायक टीम से ना बल्कि दर्शक से होन्दि, टीम त अपणू सौ प्रतिशत लगान्द, अपणों नौ गुय्या रखण क्वी नि चान्दो। फेर बि पूरि कोसिस कना का बाद कुछ इना चीज छूटी जांद ज्वा दर्शकों पर छाप नि छोड़ि सकद। सब्बी एंगलों बिटी देखा त ‘खोळी का गणेश’ फिलमन दर्शकों मा छाप बि छोड़णिन अर वे मिथक तैं बि तोड़णिन ज्व आम लोग बोल्दन कि गढ़वळि फिलम मा क्या रख्यूँ छ ?
तिसरि बात - पटकथा लेखन, संवाद अर निर्देशन, या तिन्यां चीज श्रियुत अविनाश ध्यानी जिका खाता मा जांद, ध्यानीजि युवा फिल्मकार छन। स्क्रिप्ट लेखन, निर्देशन का अलौ वा एक बड़िया अभिनेता बि छन, जनुकि मिन मथि बोलि कि फिल्मै पटकथा हमारा समाज मा साख्यूँ बिटे चलणि छूवा छूतै कुप्रथा पर छ, यनु संवेदनशील विषै रखि निर्देशकन भौत बड़ि जिम्मेदरि निभैन। फिल्म मा संवाद सटीक अर विषय अनुगत छन, संवाद सुद्दी लम्बा नि खिंच्या। यांका अलौ कैमरा एंगल, शौट, विजुअल इस्टेल, लोकेशन जगा, सेट डिजेन अर संपादन मा बड़िया काम होयूं, ये पर जादा बात कने मेरि जानकारी कम छ। हाँ फिलमै भावना अर सामजिक रैबार समाज तलक पौंछाण मा डारेक्टर सफल से बि उपर छ।
चौथी बात कलाकार - फिलम का लीड कलाकारों मा अभिनेता शुभम सेमवाल अर अभिनेत्री सुरुचि सकलानी अपणा अभिनै का पैला पैदान मा होण पर बि यनु नि लगद कि स्ये नवाण छ। अर द्वीयून अपणा अभिनै से या बात साबित करियाली कि स्ये लीड रौल मा कै बि फिलम तैं सफल बणैं सकदन। दगड़ मा अज्यूं भौत कुछ सीखणैं जरोरत छ, बड़ौ कलाकार बणणे जात्रा सतत जारी रन्दिन। संजय मिश्रा बणण मा बगत लगद। द्वी नौन्याळौं तै अग्नै वास्ता शुभाशीष।
अगर सह कलाकरों कि बात करे जाओ त भैजी गोकुल पंवार जी जना लोक का ऐन-सेन एक्टर दगड़ विनय जोशी कि दीपक दगड़ बड़िया जोड़ी, सुशील रनाकोटी, अरविंद पंवार, रश्मि नोटियाल, दिव्यांशी कुमोला, राजेश नोगाई दगड़ सब्बी कलाकारों कु बड़िया नापि-तौल्यूं अभिनै छ। हाँ यख बि कुछेक कलाकरों कु संवाद उच्चारण विभेद लगि, किलै कि कति जगा तौंकु लिंगीय संवाद मा संबोधन गलत होणू, ह्वे सकद स्ये बि व्यवहारिक हिन्दी परिवेश से होला यांमा वूंकु दोष नि, पर औण वळा टेम पर यीं बात तैं याद रखला त अपणा व्यौहार मा गढ़वळि रखि आप बि दीपक रावत जना दमदार अभिनै कोरि सकदन।
अब बात करला यीं फिलम का सबसे सशक्त एक्टर दरवान दास, दीपक रावत जिकी जोन अपणि दमदार एक्टिंगै छाप देखदारों पर छोड़ि। पता नि सु मनखि आज तक कख लुक्यूं छौ या मि ही लिक्यूं रयूं, खैर मि त लुक्यूं ही छौ पर इनै-उनै की त सूणि जांदू छौ तौं बौडरों पर। अविनाश ध्यानी जितैं साधुवाद, आपक धौर बिटे दरवान दास एक यादगार भूमिका बणगे। दीपक का सद्यां अभिनै का वास्ता शब्द कम पड़णा। येकु एक मुख्य कारण यु बि छ कि कलाकार विशुद्ध व्यौवारिक गढ़वळि परिवेश बिटे छ, इलै वेतैं संवाद का अनुरूप ढळण मा जादा मीनत नि कन पड़ि होली । जति बगत अर मीनत हौरि कलाकार संवाद बींगण मा लगांद तति मा विशुद्ध लोक कलाकर अपणि एक्टिंग तै सुधारी देन्दू। या बात सब्बि कलाकरों तैं टक लगै कि बींगण जरूरी छ।
अग्नै बात करे जावो गीतकारै त विनय जोशी जिन बड़िया गीत लेखिन अर वूंतैं आधुनिक संगीत मा ढाळी अमित बी कपूरन वर्तमान लेक बणाई। हाँ क्वी गीत लंबा समै तलक हमारा लोक मा बजणू रैलू अर लोक का कंठो मा आणू रैलू इनि सम्भावना कमति लगणी। कालजयी गीत बणाण अर होण अफूं मा एक बड़ौ संघर्ष होन्द, या बात हमारा गढ़रत्न नरेन्द्र सिंह नेगी जी मु जै कि सीखण पड़ली।
अग्नै बात सिनेमेटोग्राफी की त उत्तराखण्डी फिल्मों मा यनु काम कम ही देखणू मिली आज तलक, यीं फिलमै सिनेमेटोग्राफी उत्तराखण्डी सिनेमा का भविष्य वास्ता शुभ संकेत छ कि फिल्मकार यीं बात पर अब बड़िया फोकस कना। अर करदा बि किलै नि जब इतगा बड़िया साज-बाज मैजूद हो, बगत का दगड़ बोगण जरूरत बि होन्दि अर जरूरी बि।
आखिर मा निर्देशक अर लेखक अविनाश ध्यानी मु काम कनो बड़िया अनुभौ छ या बात यीं फिलम मा देखणू मिलद। बिजातीय प्रेम कथा एक जटिल विषै छौ, यु विषै आपन समाज मा रखी बड़ी हिम्मत दिखै। फिर एक दां पूरी फिल्म कुटुम्बदरि तैं बधै अर साधुवाद।
@ बलबीर राणा ‘अडिग’
https://youtu.be/xKaAnrJDYqE?si=xR5nyb9_dqMr5sYI
आयौ रे फागुण मैना,
वसंत बहार।
आवा दगड़यौ नाचा गावा ,
हौरी को त्यौवार।
म्वारी भौंरा गीत गाणा
फूलौं-फूलौं पात
सारियूँ खिलीं पिंगळी लयाँ
हैंसदी फ्यौँली पाख
बणों मा बुराँस हैंसणू
हैंसणी डांडी धार। 2
आयौ रे फागुण मैना,
वसंत बहार।
आवा दगड़यौ नाचा गावा ,
हौरी को त्यौवार।
ढोल बाजौ दमुवा बाजी
हुड़का ढोलकी ताळ
नचा-नाची भैर भितर
ज्वानों को उछयाद
रंगौं मा यी खाणि-पीणी
रंगौ को सिंगार।
आयौ रे फागुण मैना,
वसंत बहार।
आवा दगड़यौ नाचा गावा,
हौरी को त्यौवार।
दाना संयाणा रंगमत
बाळा खेलवार
हौळयारौ की डार ऐगे
खौळा अर तिबार
साज-बाज सजिगेनी
सजीगे पैरवार।
आयौ रे फागुण मैना,
वसंत बहार।
आवा दगड़यौ नाचा गावा,
हौरी को त्यौवार।
थौ बिसौंला काम-धाणी
बिसौंला खुद पराज
मेरु-तेरु तब ह्वे जैलो
गौळा भिंटोला आज
झिट घड़ी रंगमत रौला
रंगिलौ छ दिनबार।
आयौ रे फागुण मैना,
वसंत बहार।
आवा दगड़यौ नाचा गावा,
हौरी को त्यौवार।
@ बलबीर राणा 'अडिग'
वल सारी सटयाड़ी पल सार क्वदयाड़ी
रौंत्याळी डांडियूँ बीच गौं-ख्वाळी हमारी।
मेरा गौँ मुल्क देखा हरीभरी हरियाळी
धरती मा स्वरग चा गढ़भूमि हमारी।
हियूँ चूळा कांठा अर मखमली बुग्याळ
पंच बद्री पंच परयाग, पंच छन केदार
घर-घरौं बिराज्यान थौळ अर थान
द्यौ भूमी धरती बसदा द्यौ द्यबता नमाण
बारा मैना बारा मासा रंगत रंदि भारी
धरती मा स्वरग छ गढ़भूमि हमारी।
कांठौं की पीठ बटे छीड़ा छन बगणा
पाखौं की छत्ती बिटे छौया छन फूटणा
बसुधारा मंगरौं बगदो अमृत जल पाणी
गंगा जुमना कु मैत हियूँ चूळा हिमानी
कळ-कळ छळ-छळ छप्प-छप्प छळारी ।
धरती मा स्वरग छ गढ़भूमि हमारी।
बामणी बौडी धै लगाणी चौक का तिर्वाळी
पुंगड़ौं मा हमारा क्वो छ तू घस्यारी
घात चटमताळ कनि काकी स्या चुनारी
किलै खाई मास्तौ तुमुल कखड़ी सु हमारी
तकदक साग भुज्जी छन बाड़ी सग्वाड़ी।
धरती मा स्वरग छ गढ़भूमि हमारी।
लौ-मान बगत बार पिंगळी छ सार
नाज-पाणी रड़का-रड़कि भौर्यान कुठार
मौ-मदद हाथ बड़ौंदा देंदा सौंग सारौ
खुसी खुसी उच्यांदा लोग मनख्यातौ भारौ
सुख दुःख मा सौंग सारू देंदी बेटी ब्वारी ।
धरती मा स्वरग छ गढ़भूमि हमारी।
मेरी लाड़ी मेरी दुलारी
सूनों करि जाणी चा सारी
जनि बणि रै तू लाड़ी हमारी
तनि तख तौंकि बणि रयाँ प्यारी ।
उदंकार छै मेरी
घर कूड़ी त्वैसे
अब भणंकार ह्वैगे
भैर भिर्त त्वै बिन
दिवा बणि रै तू
ब्याली तक जन मैत मा
रांकू बणि रै तनि
भोळ बटे सौरास
परमत रख्याँ तैेे सौरास हमारी
मेरी लाड़ी मेरी दुलारी
कुखड़ी सी बांग
छै तू यीं द्यैळी मा
मयळी बिराळी जन
घुसेेन्दी छै ब्वे-बुबों मा
जनि कांडा गाड़ी तिन
हमारा खुट्टियूँ का
तनि तौंका खुट्टियूँ मा
कांडा ना बुड़ण द्यायी
खुद लगली तेरी हूमूं कैं भारी
मेरी लाड़ी मेरी प्यारी
रैन्दू छौ तेरु
घिन्दुड़ी जन फफर्राट
होन्दू छौ तेरु
घ्वीड़ा जन तिबड़ाट
चट्टबट छै जन
यीं उबरा डिंडयाळी
छळबट रयां तख
सौरस्यूँ कि सारी शाळी
अपणों मा खूब हुयाँ मायादारी
मेरी लाड़ी मेरी प्यारी
अब सु घौर
छौ तेरु अपणूं
माया लगै की
जिंदगी तखि खपौण
तख ही छन तेरी
जिंदग्या का काम धाम
मैत कि छै तू
द्वी दिनैं कि मेमान
नाक धौरी अपणूं घरबार संभाळी ।
मेरी लाड़ी मेरी दुलारी
सूनों करि जाणी चा सारी
जनि बणि रै तू लाड़ी हमारी
तनि तख तौंकि बणि रयाँ प्यारी ।
Adig