कोसिस करदूं
कि! बगत बगत पर
ऊँ दगड़ भेट-घाट करि औं
ज्व नि ऐ सकदन
मिमा भेटणू सैर मा।
पाखौं मा मुळ हैंसदि फ्यूंली
बणों मा खिखताट कर्दा बुराँस
झपन्याळा बाँज,
ऊँचा लम्बा तड़तड़ा देवदार
मखमली बुग्याळ,
नौळा-मंगरौं कु ठंडू पाणी
छीड़ा-छंछरा गाड़-गदनौ कु सुंस्याट
अर......,
चम्म चमकदी ह्यूँ चुळिख्यूँ चळक्वाट।
मिली कि ऐ जौं
नि छ जौं मा घड़ेक थौ टेकणू बगत
जु रिंगणा रन्दन गिरस्थी ओर-पोर
घासा सुयटा तौळ पस्यौ मा लरतर्र बोजि
चुल्ला-चौक, कुटण-पिसण मा रिटदी दादी
तिर्रवाळ ढिस्वाळ मेसि पर हैळ लगान्दू भैजी
ब्यखुन्दा तासों मा मस्त काका-बौडा।
सेवा लगै औं
वूं तैं ज्व छन हमरि रीती-रिवाज
धरम-संस्कृत्यै पछयाण
द्यो थानो का नीज-निसाण
धुयांळ देंदा ढोल-दमुवा
मडाणों का पश्वा-डंकरि
डौंर-थाळि, हुड़का पर धौंस्या-जगरि
चाँचड़ी-चौंफुला ख्यलवार
ख्यौळा-म्यळों का हुळयार।
भिटवळि लगौं ऊँ दगड़
जौंका हौंस-उलार दगड़
बाळौपन खिलपत खिल्यूँ
गुणी-बांदर, घ्वीड़-काखड़
खुदेड़ हिलांस,
मयळि घुघती
छिंज्याट्या सिंटुला
मेलख़्वार घिंदुड़याँ।
पर! कब्बी कब्बी
सब्बि जतन अर कोसिस
बगतै भताग खान्दी
सैरों सैणि गळयूँ मा गुर्ती जांद
अर, मेरि खुद /आसा
दौड़दी गाड़ियाँ,
भगदा मनख्यूँ का
भिभड़ाट मा भरमे जांद।
15/10/25
@बलबीर राणा 'अडिग'



