धर्ती पर जीवन संघर्षों वास्ता च, आराम त यख बटिन जाणा बाद, ना चै किन बी कन पड़ल, ये वास्ता लग्यां रावा, जत्गा देह घिस्येली उत्गा चमक, उत्गा संचय जु यख छुटलू। @ बलबीर राणा 'अडिग'
Search This Blog
Monday, 9 February 2026
आँख बंद कौरि नि पै सकदन अंधै नजर
विनोद कुमार शुक्लै संवेदनशील कवितौ गढ़वळि अनुवाद
आँख बंद कौरि
नि पै सकदन अंधै नजर
जैका झफ्फक्वळि दूरी पर छ पूरी नजरै दूरी।
फजल झुकमुक अँध्यारा मा खग्रास घामो उदै होन्दू
अर अँध्यारा मा एक हौरि घणो अँध्यारौ फ़ैल जांद,
जुन्यळि पर जादा काळा धब्बा होला
जूनी अर गैणो का।
झफ्फक्वळि लगै ही जाणि सकदन धार (क्षितिज) तैं
नजरा बोम तैं
कि सु कै आळा मा धर्रयूँ होलू
अगर धर्रयूँ बि त
कै अँध्यारा खूँटा पर टंग्यूँ
कै नक्षत्रौ अँध्यारो।
आँख बंद कोरि द्योखण
अंधा जनु द्योखण नि।
कै डाळा छैल मा
कै सड़का किनारा
घिमसाण घ्याळा बीच
कुर्सी बुणदो एक अंधा
दुन्यां दगड़ सबसे जादा पिरेम करदूं
सु झफ्फक्वळि मा कुछ दुन्यां तैं स्पर्श करदूं
अर भौत दुन्यां तैं स्पर्श कन चांन्दो।
हिंदी साहित्य का भौत बड़ा समादृत हस्ताक्षर श्रद्धेय विनोद कुमार शुक्ल जिकी कलमै गैरे अर संवेदना तैं सत सत नमन।
@ बलबीर राणा 'अडिग'
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment