धर्ती पर जीवन संघर्षों वास्ता च, आराम त यख बटिन जाणा बाद, ना चै किन बी कन पड़ल, ये वास्ता लग्यां रावा, जत्गा देह घिस्येली उत्गा चमक, उत्गा संचय जु यख छुटलू। @ बलबीर राणा 'अडिग'
कविता बथौं जनि
दिखेन्दी नि,
बस मैसूस होन्दि
कब्बी ठंडी सुरसुर्या
कब्बी टटगार ह्यूं साड़
कब्बी ताति तौळाबोळ लू,
फेर
शब्द पकड़दी
कागज मा बिखदरी
कैका हिया बैठदी
कैका हिया उठदी
अर, कै उणि बल
माळा गोरू धौळे-धौळ।
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