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Saturday, 4 February 2023

बान-बानी का आँशू

1.

आहा !

परकतिक कोळी मा

कति स्वाणु गौं छ हपार

कति सुख आनंद ह्वोलु तख

पर !

वे पर्यटक तैं पता नि हून्द

कि

कति पस्यो अर आँशू धारऽन

सिंचण पड़द

या काठै धर्ती

सुन्दर बणाणा खातिर। 

 

2.

डाड मन

नि दिखेन्दू वा मर्द

अड़काट लगाण सुण्येंन्दो  

वा चुप

घोट मारि

खैरी का आँशू

आँख्यूं मा प्येन्दो

परिवार सुख का खातिर।

 

3.

जबैर तलक गाड़ि,

बेन्ड पार नि चलि जान्द

गळघुंटि बाँधी

टाटा ब्वनी रैन्द,

हाथ हिलाणी रन्दै

स्या

जंगलै सतीर पकड़ी,

अर

गाड़ी ओझळ होणा बाद

आँख्यों बटिन गंगा जमुना

बगाणी रौंदी

परदेश मा

तैऽका

कस्ट खैरी बगोंणा खातिर।

 

4.

वे दिन वूंऽका

आँख्यूं मा खुसी आँशू छायी

जब बेटो प्लेसमेन्ट

विदेश मा ह्वेन

अर आज ब्वै-बाबा कि

तपस्या खुदगर्ज बी

नि ह्वे सकणि

एक फोना कना खातिर।

 

पस्यो = पसीना

 

@ बलबीर राणा ‘अडिग’

Sunday, 22 January 2023

पिरेमा पाँच पुछयड़

 




1.

सच्चू पिरेम 
स्वारथ नि त्याग मांगद
अर ये तैं चैन्द 
एक हैका फर कटकटौ विस्वास 
ज्यान तकौ समर्पण।
2.
पिरेम मनाणू 
जर्रा सि 
श्रद्धाऽक फूलों जर्वत होन्द  
बाकी 
वासना पुळयाणू मनखी
इच्छाऽक हजार टूणा 
कना रैन्द। 
 
3.
वासना तृप्ति, 
अर,
पिरेम अतृप्त हून्द
पिरेमें तीस जीवन सांस 
तलक रैन्द। 
4. 
पिरेम 
एक फूकऽन बजद 
जौंळा मुरुली सुर छ
यू ही अनन्त नाद, 
अनहद मा पौंछणों बाटू छ। 
5.
सयी पिरेम करा त सयी 
ये कि स्क्रीन सदानी
अनलॉक मिल्ली 
यख पासवर्ड 
या लॉक पैर्टन नि पड़यूँ रैन्द
एक हैकऽक डाटा 
ऑपन रैन्द 
ना ये तैं क्वै हैकर 
हैक कैर सकदू।  
*©® @ बलबीर राणा ‘अडिग’*

Thursday, 12 January 2023

पाँच पंचक

 


1.

वोट मेरु

भडू तौं कु

पाणी मेरु

तीस तौं कि

जमीन मेरी

हळया तौं कु

नाज मेरु

कुठार तौं का

रसौड़ू मेरु

लदौड़ी तौं की

मितैं क्या दिनी रे

विकास ! त्वेन 

घुनत्या ?

 

2.

क्वै भजैन

क्वै भाजिन

द रे विकास

रीता कनु

आई तू पाड़ौं मा। 

 

3.

कब्बी दबिन

कब्बी रौड़ी बगिन 

अब रयीं सईं

दड़-दड़की चीरिन

ऐ...रे विकासऽऽ ?

छ रे ! कुछ हौर ?

बिणासौ विज्ञान

तै बि बुलौ दों बल।

 

4.

ना पूछ बाबू !

अब त आदत पड़िगे

रूण-धूणें-डाड मने

थौकि कि जमाणें

ज्यूँरा का छवाड्याँ

अवशेष टीपणें

नै कुटमणा जिमाण-जंपणें

स्वेंणा सजै, हैंसणें

अर फेर

डाड मारी पच्छाड़ खाणें

ये शरेल मा सांस तलक। 

 

5.

द्यबता बसायी छौ, द्यबतोन

आस्था लूटी तुम सब माबुतोंन

अब किलै छन डाड मना

जब पाप करि सब्योन।

 

@ ©® बलबीर राणा अडिग

12 जनवरी 2023

 

Saturday, 7 January 2023

दस ढसाक



1.

मि राणी तू राणी 

क्वो भरलो पाणी

इनम नि जिमण्यां गिरस्थी 

एक पाथू हैकु चार माणी। 

2.

चटपट हिटदी चढ़ि

सुरक सौजी सड़ि

दुन्याल त ब्वनै च 

मठ ह्वो चै मढ़ि।

3.

हैकों  देखी लायीं खायीं  

जौं कु लग्यूँ पन्यळु पाणी 

म्यार बाबै कन मति मरिन 

ज्वा स्या नि मांगी। 

 4.

खीसा नि पाई पल्ला 

चल भै द्वी ब्यौ कला 

पाथु उठाणें सक्या नि 

चला जी, ढाकर चला।

 

5.

जति खस्या मनोंण 

वति खस-खस कन्यौंण 

जै का गात झर्रऽ न ह्वो

वेतैं क्या भान क्या भौंण।


6.

मेरा बुबाऽन घ्यू खाई 

बल मेरु हाथ सूँगा

रैग्यां तुम गरुड़ घिन्दूड़

अब दाणी-साणी यी ठूँगा

7.

अफूँ खणमणकार रीता 

हैका तैं पढ़ौणा गीता 

फजल कौरा ज्ञान ध्यान फार्बट 

चै करम मौसुऽन लीपा।

8.

नंग ना खूर 

किलै आई यति पूर

नि छै जब सक्या त

किलै करि पैली कटमचूर।

9.

अब ना भितर, ना भैर 

कु जगौऽक जिठाणु वैद्य 

त्यारा ठाट-बाट हमूतें बाबू 

चूळा-चाँठों परौ सैद। 


10. 

देख्यूँ मैंस क्या द्यखण 

तापि घाम क्या तापण

थूक चाटण म्यार बसौ नि  

तू अब ना जंपण, ना थापण।


©® बलबीर राणा ‘अडिग’

गजल



किनारा खड़ा रंद, तमासु  द्यखण वळा,

भमs फाळ मारी द्यना, पार  द्यखण वळा।


करणी कुछ अर करणहार कुछ ब्वनु,

घंघतौळ मा छिन मेरु भागेष द्यखण वळा।


हैकsक चव्वो ढूँग खैना ठुलो होणु कु,

अपणी पौ-औलादे कतै नि स्वचण वळा।


चस्सा कमरों मा चुप ज्यू लगोंणा बल,

तड़तड़ा धारों मा घाम तापण वळा।


जिंदग्या बाटों मा भिटवळी अगिणत होंदी, 

पर, यादों डवार ख्वळद फर्की द्यखण वळा।


रोण-खोण अपणा लक-लकार पे अडिग , 

पर, क्या पांदा ह्वला हैकों ध्वछोंण द्योण वळा । 


शब्दार्थ:-


खैना - ख्वदणा

फर्की - मुड़ी कि 

ध्वछोंण - बुरी बात ब्वोली टवकण,


@ बलबीर  राणा 'अडिग'

Thursday, 8 December 2022

घौ (घाव)



पैली घौ 

मेरी गरीबी

दुसरो घौ

वींको मेरा नौरुं सारु बणण

तिसरौ घौ

वीं तैं मेरु नौर देण

चौथू घौ 

कैमरा इन्टरव्यू वळों कु

जु पूछणा कि 

वीं दगड़ क्या ह्वेन ? कनुक्वै ह्वेन ? 

पाँचो घौ

न्यायौ भरसू ध्योंण 

अर धरना नारा लगाण वळों 

छटों घौ 

न्याय देण वळों को अन्यो

सातों घौ 

नोनी बुबा होण

आठों 

घौ सोणे 

अब मिमा हिगमत नि।

 

आत्मा फर कच्चाक च पड़ीं

दिन रात मवाद पीप बगणू 

घौ पकीं पिलपिलौ ह्वयूँ

जैतें सत्ता, पैंसा का डाक्टर 

लगातार पितौड़णा।


नौर – कंधा

 रचना  : बलबीर राणा अडिग

भड़



1.

काळा कनूड़, ऊँचा डानों

कठिनै-खौरी जिती 

जब  तू  वीं आखिर चूळा पर ह्वलो 

तब  त्वे लगलो  कि 

क्वी फर्क नि त्वे अर 

तों पाड़ें सगते मा जों तैं 

त्यार ख़ुट्टोन चिपाड़ी,

एक भड़ल नंगायी।

2.

जब तू झैली साकलो 

मैनस पच्चास डिग्री मा हियूँसाड़/ तूफ़ान, 

तब  तू  बिंगलो भड़  तैं  

जौन डिक्सनरी बटि 

असंभौ मठायूँ  रैंद।

3.

सौंग नि भड़ होण  !

हौंग चेंद 

हियूँ चूळा कांठों मा 

यकुली तीन सौ  दुश्मनों दगड़ निबटणे।


यति मजबूत जितम कि 

होरों सुखों वास्ता छत्ती नौन्याळे बलि ध्योंण पर  भी  झर्र  झस्स ना ह्वो ।


खून मा यनु उमाळ कि 

पंद्रा साल मा यी 

दुश्मन सेना बैखों तें 

बैख होंण मा शरम दिलै ध्ये। 


बाकी 

अजक्याल रील बणाण 

वळा भिज्याँ छिन 

भ्योळ भंगार जाणा, 

लमडणा, 

जौं  तें लोग भड़  ना तमास्या बोलणा।


*असौंग  शब्दों अर्थ*

कनूड़ – घणु  जंगळ

हौंग-हिगमत

जितम – छाती


*@ बलबीर  राणा  ‘अडिग’*