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Monday, 24 May 2021

स्यौ लगोण छै

 



                बालम अर चैन सिंग द्वी इस्कुल्या दगड़या पलै* सालों बटि मिलिन। असल कुसल ह्वेन। कैकु जीवन चर्खा कति घुमणु कनु घुमणु बात विचार ह्वेन। बालम सिंग - यार दिदा मिन सूणि त्वेन नोनी बि बिवैल बल ?

चैन सिंग - हाँ यार भुला लगुली अर ब्यटुली जति छाँट ह्वो ठंगरा लगे दीण चैंद निथर वीं भुयां गळजी* जान्द।

बालम - हौं दिदा सयी बात च। दिदा मिन सूणी भलु घौर बार मिली बल नोनी थैं । दिल्ली बि चलग्ये बल जवैं दगड़। सच्ची ?

चैन सिंग - हाँ यार भुला ठिक यी छन ब्वाला। ये संगसारा सोब रिस्ता स्वारथ का बल। अब बेटुल्यों तैं द्याखा। भलु जवैं अर धैन-चैन* बळी मवसी मिली त मेरु भाग ल्येन ये घौर मिथैं, बुबा क्वो होन्द देण वळु अर कखि पस्यौ धारा गरीबी लारा मा कटेणी त मेरा बाबै नि खाण ह्वेन, जु यीं घौर द्ये मेरु बूरू करी। पर चलो खुसी छ अपणा होन्दा खान्दा दिखेन्दा त हरीश लगदू। अर द्वी मितर अपण अपणा बाटा लगिन।

                कुछैक साल बाद नोनी जवैं क तरक्की ह्वे साब बणिन, त नोनी हलण-चलण* बि साबिण वळु होणे छै। गौं मा सब्यूँ तैं पता छै कि अलाणा फलाणें नोनी जवैं बड़ो साब बणिग्ये। नोनी भाग्येस मा बिरस्पति जु बैठयूँ छै।

एक दां नोनी मैत ऐन,  जनि खौळ मा पौंछिन त तैन सौजि बाबा तैं ब्वोली। बाबा जर्रा पिछने क्वलणा* चला दौं।

बाबान बोलि किलै बाबा ?

नोनी - स्यौ* लगोण छै।

चैन सिंग अचरज मा ! दुन्यांऽ छीड़ा छंछड़ों छपोड़यूँ मनखी छै। वा बिंगी ग्ये। तेन उनि सौजि। बाबा आदिम रिस्ता पैदा कर्दू आदर ना। त्वेतैं तति सरम छै लगणी ये बुबा देखि त इन कैर तु बुबा ब्वोली ना। क्वै जबरदस्ती नि, क्वे नि बिलकणु* ? मिन ठिक यी सूणि छै कि बड़ा पद अर कदाऽ झ्याला* तौळ आदर कुर्ची* अर रिस्ता गौळि जान्दा बल।  

 

असौंग शब्दों अर्थ

 

स्यौ - सेवा सौंळि।   पलै - भिज्यां भौत।   गळजी - अळझी कि गलण। हलण चलण - चाळ ढाळ।   क्वलणा – कुलाणा/ मकानो पिछने हिस्सो।  बिलकणु - लगणु।  कदाऽ - कद के।  झ्याला - लगुल्यों जाळ ।    कुर्ची - कुरचण।

            

Friday, 21 May 2021

पिरेमों व्याकरण

 कब्बी स्वर कब्बी व्यंजन

दगड़ दगड़ी बरोबर जतन

ना जादा मातरों घंघतौळ

न सर्ग विसर्गों झौळ

ना अल्प विराम

नि लगाण पड़दू पूर्ण विराम

शब्दों कि अनन्त डार

जति लंबी जातरा वति ग्रंथ अपार

एक हैकक चंद्रबिंदु, साज सिंगार

मिठ्ठी करकरी छुयोंक रस अलंकार

बस सुणण/बिंगण - मनाण/मानण 

इतगा त सरल छ, पिरेमों व्याकरण।


Sunday, 16 May 2021

मन मादेब डिगण ना दियाँ (करोना बिमरी से लड़ण वळा सब्बी प्रियजनों तैं सर्मपित)




हर्यां हिया तैं हिराण ना दियाँ,

मन मादेब डिगण ना दियाँ। 


छोड़यां ना दग्ड़या आशा कि ड्वोर, 

औणा ना दियां निरासा ध्वोर,

होंग ना हार्यां उमेद ना छोड़याँ,

काल करोणा जितण ना दियाँ।


हर्यां हिया तैं हिराण ना दियाँ,

मन मादेब डिगण ना दियाँ। 


नाजो कुठार तेरु भर्यूं छै,

यीं थाति तेरो बांठु बच्यूँ छै,  

अपणु बांठो कैतें ना सौंप्याँ,

करोणा बिमारी जीति कि रयाँ।


हर्यां हिया तैं हिराण ना दियाँ,

मन मादेब डिगण ना दियाँ। 


जतिगा तागत सक्या च त्वेमा, 

उतगा पराण नि छिन ये मा, 

छन सक्या कु निरसक्या ना हुयाँ,

खांसी बुखारन भैकाम ना कैर्यां।


हर्यां हिया तैं हिराण ना दियाँ,

मन मादेब डिगण ना दियाँ। 


दिन बौड़ी आला बगत बौड़ी आलु, 

काळि रात ब्येली फजल ह्वे रालु

बगत पैथऱ ते खैरी भ्येजि दियाँ,

हिकमत रख्याँ सांसु बड़ै धैर्या।


हर्यां हिया तैं हिराण ना दियाँ,

मन मादेब डिगण ना दियाँ। 


आशावाद दगड़या ज्येणु कु नाम,   

त्वै दगड़ तेरा ईष्ट भगवान, 

डाक्टर द्यो विस्वास रख्यान, 

दगडा छिन तेरा जलड़ा नमाण। 


हर्यां हिया तैं हिराण ना दियाँ 

मन मादेब डिगण ना दियाँ ।


@ बलबीर राणा अडिग

Sunday, 9 May 2021

नरसिंग देव जम्वाल जी की डोगरी कविता "दोषी कौन"



--: दोषी क्वो:--

ब्वै त जननी च

चै नोनु ह्वावु या नोनी

जलम देंण ब्वै कु धरम च। 


बुबा बी भले किलै नि चालु 

खवळ्यांस, कौंळी, फुन्ने कुटमणि जन 

सुंदर कन्यां घोर आउन

भैज्यों तैं हैंसणी ख्यलणि 

ज्यूंदी गुड़िया जनि भुली मिलुन 

रक्षा बंधन, भय्या दूजा दिन 

लुकाण ध्येलों मा ढूढंण से 

अपणा घोरे कन्या कु पुजन ह्वे जौं। 

पर !!

बुबा तैं याद औंदा 

दुन्याभरा अखबार

पत्रिकाएं, रेड्यो, टीवी 

जु देन्दन खबर 

लंड्यरों छेड़खांदी, 

उठाण, अपरण, मार काट

अर ब्वारयों तैं ज्यूंदा जगोणे छुवीं। 


इतगा नि ! 

होरि क्या कुछ नि होंन्दू बेटुल्यों फर

मन सरेले निगुरी पीड़ा, 

ल्वेछाण अर बजारी सौदा। 


ऐ बवैई !! 

कम्पी जांदू बुबा खुट्टा बटि मुंड तक

घूमि जांदी 

वे कि निर्ख़ालिस नजर 

दुन्यांभर का मनख्यों  फर

मन्ख्यात फर, समाज फर 

अर वे सृष्टिकर्ता फर बी, 

अरे आखिर क्वे त द्यावन वे तैं विश्वास 

एक सुखी सुरक्षित 

इना वातावरण को

जेमा ल्ये साकु बेटुळी जलम

अर वा लाड़ि कौंळी गुड्या 

हैंसी खेली भौरिं साकु

अपणा मने ऊँची उड़ान 

कौंळा पोंखुड़यों मजबूत कना वास्ता।


फेर, 

ज्वान ह्वे 

राखि साकु लाज

हमरि मान मर्ज्यादों कु

तीन कुलों कु।


रचना : नरसिंग देव जम्वाल

अनुवाद : बलबीर राणा 'अडिग'


मिमा डे नि ब्वै च



मिमा डे नि  ब्वै च
वा ब्वै
जु फजल्ले झप्प गाळी थुपुडू 
खल्यादी मुंड फर 
कि, छांट उठ रे घाम द्वफरा ऐगये 
इनि कनक्वै होण तेरी मवसिन। 

वा ब्वै 
जु टक लगे धै लगेंदी 
चड़-चड़ा द्वफरा 
संकवलि ओ रे लाटा
भात खाणु
घाम पोड़ीगे, बिमार पड़ी जालू। 

वा ब्वै 
जु व्यखुंद औंदा जांदो मा पूछदी
मेरु नोनु बी देखी तुमन 
अज्यूं नि आई वा 
तफुन अलाण-फलाणा जाग बटिन । 

वा ब्वै 
जु चट अगलर्या बणि जैंदी 
वे टेम जब क्वी मि दगड़ 
छिंज्याट रिबड़ाट करदु। 

वा ब्वै
जु हर बगत फोन पर पूछदी
अज्यूं खै नि खै
क्या खै ? कबैर खै, 
कमजोर ना ह्वयां, 
बिमार ना पड्यां। 

वा ब्वै 
जु बीमार, दिसाण मा पड़-पड़ि 
रबड़ाट लगांदी कि 
मि ठिक छ, मिउण कुछ नि चैणु 
तु खौ, तै ब्वारी नातियों तैं खवो। 

मेरी ब्वै त
हर घड़ी, हर बगत सदानी 
मि दगड़ रैंदी 
वल्या सोर, पल्या सोर बटि
दूर परदेश, बोडरों तक 
सांकि मा, बडुळी मा। 

इलै मिमा
एक डे दिन बार ना 
सदानी डे च
सदान्ये ब्वै च। 

म्यारा बसे नि 
एक दिना वास्ता कविता ल्यखण 
मैं दगड़ हर घड़ी कविता च
अपरम्पार कविता
सर्या वेद उपनिषद 
डेड अक्षरों मा
ब्वै। 
वीं फर कविता ? 
ना भाय ना। 

फेर बी सब्यों का
मान मान्यता कु
आदर च, मान सम्मान च। 

सम्मान च वीं ब्वै कु
जैकि आँखि इकुलकार 
शीला ओबरां धूँयेणा मा फुटिग्ये। 

मान- सम्मान च वीं ब्वै कु 
जु आसा पर छ कि एक दिन वेकु नोनु 
वीं तैं ल्यी जैलू बृद्धाश्रम बटिन। 

आदर च वीं ब्वै कु 
जु आसा पर छ कि 
एक दिन मेरी ममता जगि जैली
अर वा द्वी साबुणा टिकड़ा
अर चा चीनी थैलु भेज द्योलु ब्वारी मा लुके। 

अर आदर सम्मान च वीं ब्वै कु 
जु करोना बेड मा पड़ीं आसा लगीं कि
अब्बी नर्स डॉक्टर बवल्ला कि माता जी 
लो बात कर लो 
आपके बेटे का फोन है।  

@ बलबीर राणा 'अडिग' 
Udankaar. 




 






 


Sunday, 25 April 2021

अखार्द चीजे कीमत : लोक कथा

 


  बात वीं समयै च जबारि जमानु बड़ा अर संजैत मवासी होन्दी छै। मवासी गार्जिन बड़ा-बूड़ हूँदा छै। गार्जिना ब्वल्यां फर परिवारा सब्बी छवटा बड़ा काम कर्दा छै पूरो ढब-ढुब (मैनेजमेंट) गार्जिना हाथ रैंदो छै। बल सात पाँचे लकड़ी एक कु बोझ। हर घौर अपणा यूँ दाना सयाणों गैडेन्स फर परिवारे गाड़ी चलोन्दा छै। आज कतिगा घौर मा या जिमदरि परिवारा दाना सयांणा निभाणा छन पता नि। बल अनुभौ से ठुल क्वी गुरु नि होन्द साब। अर अनुभौ आन्दू बाटा हिटी। अनुभौ जीवना टयाड़ा-म्याड़ा बाटों फर ठोकर खै अर सिद्दा सैणा मा ठौ ल्ये होन्द। अजक्यला गुशलखाना फ्वारों मा सुगन्धित साबुण तेलो अस्नान सि जादा पक्को बड़ू अनुभौ छीड़ा छंछड़ों का छपोड़यां आदिमों दिखेन्द।

     तबारि ही ब्वोलुला, किलैकि आज या बात गरुड़ा घिन्दुड़ा ह्वेगी। तबारि भैऽरो काम-धामे जिमेदरि बैखें रैन्दी त भितरे सैर-समाळ घौरे मालकिण संयाणि लोड़यां (जनानी) कर्दी छै, या मा ददी बौड़ी या जेठी बांठी ब्वारी यी होन्दी छै। यानि घरबार्या, गृहलक्ष्मी। 

त साब कानी या छ कि एक बुढ़्याऽक चार लड़ीक छै बल। सब्बी ज्वान जमान। सब्बी बिवै-बर्याली छै। परिवार मा मनख्योंक घिमसाण छै। पूरी भवनचारी। उबरा डंडयाळी नाती नतैंणु धिधर्राट भिभड़ाट। खौळा चौक, डोखरा पुंगड़ी ब्येटी-ब्वार्यों चपळाट। गुठ्यार गाज्यूं रमड़ाट। बोण चानफुर्या बल्दोंऽक डुकुरताळ त दौंळा फर मुर्रा भैंसी फुंफ्याट-अड़काट। बिरळी सि लेकर घ्वड़ा तक गाजी, स्योण (सुई) सि सांबळ तक औजार, डोखरा पुंगणे लागत सतनज। रैस मवसि। अन्नाऽक भौर्यां कुठार अर धन्ना भौर्यां गुठ्यार याने गाजी (पशु) धन। सम्पूर्ण गिरस्थ, जिम्दार मवसि, दिन रात पन्याळुन पाणि लग्यूं रैन्दू छै।

     परिवार मा भैरऽक सब्बी ढब-ढुब बुढ्या अफूं खुद द्यखदू छै अर भितर बुढळी। एक दिन द्वी झण बूढ़-बुढळिन मिस्कोट करि कि अब घौरे या जिम्दरि कै नोना ब्वारी तैं दियीं जो किलै कि स्याळ न्याळ भ्वोळ यूने या कूड़ी समाळण, समै फर हम यूं तै दिखाला सिखाला नि त भ्वोळ यूँ कि मवसि ढक्ढ्याना ढुंगा मा बैठि जाली। हमारु घाम स्येळु पड़िग्ये, बुड़योण मा देर नि। जब ब्वै-बाबन अपणी बात नोना-ब्वार्यों मा रखिन त वा सब्बी घंघतौळ मा पौड़िग्यां। कि अब्बी त ब्वै-बुबा ठिक-ठाक राजन-बाजन छाँ किलै अज्यूं बटिन यनु ब्वना। सब्योन मना करि कि हम भैरऽक काम देखळा भितरै समाळ तुमी कैरा। बूढ़-बुढ्यान तौं तें समझै-बुझैन। बुबा भ्वोळ ब्याणि तुमुल ही या जिम्दरि निभाण। हमारा ज्यूना-जागन मा देखी सीखी ल्या। भैराऽक डुट्याळगिरी त क्वै बी कैर देन्दू फर भितरै समाळ मजबूत चैंद, भितरै समाळ मवसिक चव्वा हूँन्द। तुम सुरु त कैरा दों। जु बि कमि पेसि ह्वली सुधारो बाटु बतौला। त साब, भैरे सब्बी धाणें जिमेदरि ज्यठा नोने ब्वारिन हाँ ब्वोली, फर भितर घरबार मा बैठणु क्वी ब्वारी राजि नि ह्वेन। सब्यूं तैं भैरो बोल (काम) ठिक लगदू। भैर वळु कुछ ना कारो पर वेकु काम अर मान जादा चितेन्द जबकि द्याळ मु वळु दिन भर फुल्यारि कुखड़ी जनि रिंगणी रैन्द पर वीं कि कामें क्वै हिणती-गिणती नि चितेन्द, जब कै दिन क्वी द्याळ मु रावो त तब पता चल्दू कि कमर कत्गा सिद्दी रैन्द।

     आखिर सब्यूंन सौ-सळा करि या जिमेदरि सबसि कण्सी ब्वारी तैं सौंपिन। कण्सी ब्वारी सब्बी मेद्यूँ मा हुस्यार अकलवान लकारवान छयी। जेठा-बांठों सि अग्ने हुणतळि होण वींन ठिक नि माणि, पर सब्योंक मनोणा बाद वा त्यार ह्वेगी। अब घरबारे मालकिण छव्टी ब्वारी। सिं ब्वारिन ब्वोली कि तुमुन मितैं अगल्यारा बणे मेरु मान बड़ेन मि ना नि ब्वनी, छवटि होण सि बड़ोंऽक ब्वल्यूं मान रखण मेरु धरम च। पर ! एक बात च। तुम सब्बयूँ तैं उनि कन पड़लु जनु मि ब्वलुलो। सब्यून हाँ ब्वोली हुँग्रा दिनी। घौऽरा सब्बी काम-काजे सौ सल्ला, मिस्कोटा बाद आखिर मा वींन ब्वोली कि भ्वोळ बटिन क्वे बि मनखी कखि बटिन बि आवुन त देळी मा रित्ता हाथ नि औण चयेन्द। चै वा चीज क्वी कठ्यार-मठ्यार (कूड़ा-करगट) यी किलै ना ह्वावो। अखार्द चीजे बि भिज्यां कीमत होन्दी। अब वा मवसि नै ब्वारी हरकण-परखण पर पैल्यां जन गिरस्थिक होण-खाणा बाटा दौड़ण लगिन। 

     एक दिन बुढ्या (सौरा जी) कखि बटिन ओणा छै। वूं तें क्वे बि चीज बाटापन अखार्द नि मिलिन त बुढ्या निरसे ग्ये कि आज द्याळ मु ब्वारी समणि क्या जबाब द्यूलु। इनि सोचद सोचदा बुढ्या डरौ-मर बाटा छै हिटणूं। तब्बी बुढ्या तैं बाटा मा एक म्वर्यूं गुरौ (सर्प) दिखिन, बुढ्यान सोचि-तौळि कि या म्वर्यूं सर्प क्या काम ऐ सकद पर खालि हाथ जै कि ब्वारी चमकै (डांट) खाण सि बड़या यीं सर्प उठये जौं। अर बुड्यान म्वर्यूं सांप लाठा पर चम्म उठेन अर द्येलि मा पौंछिग्ये।

     जनि चौक मा पौंछि बुड्यान भैर बटि धै लगै ऐ ब्वारी पाणि ल्यो बा, ब्वारीऽऽ..... आज कुछ नि मिली ले, या च एक जैरिलु म्वर्यूं गुरौ। ब्वारिन उबरा बटि बाज दिनी जी ल्योणु पाणि, तुमु थौ बिसावा। अर जु तुमारु लियुं तै तें मथि धुर्पळा मा फर्रे (फेंक) द्यावा।

     वे का बाद ना ब्वारिन अर ना ससुर जिन यीं म्वर्यां गुरौ बारा मा छुंवी बत करिन। तीन चार दिन बाद जब बुढ्या तैं फाम (याद) ऐन कि यार मथि धुर्पळा मा मेरु म्वर्यूं सर्प फरायूं छै द्यखुला तैका क्या हाल छ । इनि ना ह्वो कि कीड़ू सड़ी गळि जों अर तैका जैरिला कांडा भुयां खौळ मा ऐ छवटा बड़ा तैं बुड़ी जौं। गुरौ कांडा बि विषैला होन्दन बल। 

त साब जनि बुढ्या मथि धुर्पळा मा गई तैका आखाँ खुल्यां का खुल्यां रै गिन।

धुर्पळा मा वीं गुरों जगा स्वोनों हार पड्यूं छै।

स्वोनों हार सि म्वर्यां गुरौ जाग कने ऐन या बि एक होरि कथा छ।

     धर्ती पर हर पराणी हर जीव कु अपणु-अपणु हलण-चलण दुन्यांदरी पर्थ परमत होन्दी। मनखी त मनखी ह्वेन पर होरी जी-जबानो बि अपणु जीवनचर्या कु वैभौ होन्द। पोन-पंछी कीड़ा-मक्वड़ा सब्यूं अपणी गिरस्थी अपणी औनार-बिनार होन्दी। संगसार भौसागर बल। इनि पंछ्यों मा एक दुर्लभ पंछी छिन गरुड़। गरुड़ तैं हमारा धरम शास्त्रों मा भगवान माने जान्द। कश्यप ऋषी कु बेटा। भगवान विष्णु कु बाहन। तेज बुद्धी नजर अर बड़ू शरेल। सतजुग सि द्वापर त्रेता तक गरुड़ भगवाने कथा सि ग्रंथ भौर्यां छिन। पर आज यीं कलजुग मा यु दुर्लब पराणी मनख्यूँ का अन्ध आधुनिकरण सि नठेणा धोरा पर छिन। गरुड़ा बारा मा एक रोचक बात इनि छै कि गरुड़ अंडा द्येण सि पैलि अपणा घ्वलणा मा कुछ ना कुछ स्वोनु ल्यान्दू बल।  बिगैर स्वोनु वा अंडा नि देन्दू अगर द्येलु बि त वा अंडा सड़ि जान्दा बल। हैकि बात कि गरुड़ इना उना अंडा नि देन्दू वा सबसे खतरनाक कैलास पर्वते चट्टान पर घ्वल्यणु लगान्द। जख कि घाम हवा का अलो क्वे बि पराणी पौंछि ना साकू। 

     वूं दिनो मा याने जबारि तै बुढ्यान म्वर्यूं सर्प धुर्पळा मा फेंक्यूं छै तबारि कखि कै गौं का कै गदना मा क्वे जनानि नयेंणि छै बल। अर तैका अपणा लारा-लत्ता, गेणा-मेणा किनारा ढुंगा मा धर्यां छै। गरुड़ स्वेली होण सि पैलि स्वोने टो मा छै। गरुड़े नजर मथि अगास बटि भुयां धर्ती मा किर्मुली बि बिरै द्यावन।  जनि गरुड़े नजर जनानी स्वोने हार पे पड़िन तेन चम्म हार उठैन अर स्वां अगास मा। जनानिन तैका बाद क्या मुंड कपाळा करि ह्वलु पता नि।

     बल पुटगे आग निर्भगी होन्दी साब। जातक नमाण सब ढा-डाम सै जावो पर पुटगे ढा नि सै सकदू। ब्वले बि जान्द कि यीं धर्ती मा सब्बी खाणु कु त अयां छन जीबन नमाने सर्री लडै यीं पुटगा खतिर छन। त साब जनि गरुड़ स्वोनु हार मुख मा ल्ये अपणा रस्ता मा उड़णु छायी तनि तै कि नजर बुढ्याऽक धुर्पळा मा पड़यां तै म्वर्यां सर्प पे पड़िन। गरुड़ कु बैरी सर्प। सौतळया भै। तैकु प्यारु भोजन। अब गरुड़ बिसरीग्यों कि वेका गिचा पर हार बि च। भोजना अग्ने बड़ा-बड़ा सूट-बूट, बुद्धी-सुधि, दर्जा धार्यों तैं बि रपटणा झपटणा देखी सकदन। त तै जातकन वा गुरौ कख छवड़ण छै। तैन झप्प मोर्यां गुरौ फर झपाक मारिन अर फुर्र। हार धुर्पळा मा अर सर्प गरुड़ा गिचा पर कैलासे तर्फां।    

     अब बुढ्या कण्सी ब्वारी अकल-औनार पर गौरब छै कनु। सदानी दाना सयाणों तैं अपणी अकल बड़ी नि चिताण चैन्द। नै छंवाळी, नै पीढ़ी कु भले अनुभौ अयाणी रैन्दी पर कब्बी-कब्बी अकल सयाणी ह्वे जान्द। जिन्दग्या रुमुक दां आज बुढ्यान अखार्द चीजे किमत बींगी छै ।

 

अखार्द - बेकार

 

कथा : बलबीर राणा ‘अडिग’  


 


 

Thursday, 22 April 2021

इस्कोल : लघुकथा चंद्रधर शर्मा गुलेरी

    


इस्कोल मा वार्षिकोउत्सो  छायी। मि बि न्यूतयूं छै। हेड मास्टर जी लड़ीक जै कि उमर आठेक साल रै ह्वली वे खुणि बड़ा लाड़न गुलाबरै नुमेस कु चानफुर्या बौड़ जनु दिखै जयेणु छै। नोनु मुख पिंगलु आखाँ स्यता। कराळी नजर। मुंड खाड़। मुखड़ी चळकाट गैब। बल पढ़ण मा सबसि हुस्यार। बल हेड मास्टर अर इस्कोले माथसमपुर्सी औनार वा बाळो। बाळा तैं सर्रा बरमांडा सवाल पुच्छयेण लगिन अर वा सवालौं तडतड़ाट करि जबाबा देन्दू, तोता माफिक। धर्मक दस लक्षण अर नों रसोंक उदारण बतै गयूं। पाणी तौल माछों ज्यून्दा रैणु राज बिंगे गयूं। जून पर छाप अर गरण कु विज्ञान समझे गयूं।  अभौ कन सुबगत बणी सकदू अर सुबगत कने अभौ, दिस्टान्त सास्तर सुणे गयूं। इंग्लैडा आठवां राजा हेनरी राणी नौं अर पेशवों कुर्सीनामा तक सुणे गयूं। सब्बी सवालों  टकटको जबाब।

    नोना उत्तरन मास्टरां भितर खुस्सी लड्डू छाँ फुटणा। आखिर मा बाळा तैं पूछेग्यों कि बाबा तु भबिस्या मा क्या बणण चान्दू। बाळान मुंड मा बिठै बिठयूं जबाबा दिनी, बल लोकसेवा। सभा तड़ तड़ तड़ ताळी बजाण लगिन। तैकु मास्टर बुबा मने-मन अगास मा छै उड़णु।

    बुढ़या अध्यक्ष साबन नोना मुंड मा हाथ धैरी आश्रीवाद  दिनी। ब्वोल ब्यटा इनाम मा जु त्वे चैणु मांग,  वीं चीज द्यूला। मांग ब्यटा मांग ।

    नोनु स्वचण लगिन। बुबा अर होर मास्टर चिन्ता मा ऐग्ये कि पता नि यु क्व क्या पढ़ण वळी चीज किताब सिताब मंगलु। बाळा मुख फर ना ना परकारा रंग औण जाण लगिन। चळविचळ। तै का भितरे बनोटी अर वास्तविक भावों लड़ै आँख्यूं मा दिख्योण लगिन। वा जर्रा सी खम्म खांसी, गोळ साफ करि। नकली परदा हटिन। अर तेन सौजि बोलि। लड्डू। 

    तैकु बुबा अर हौर मास्टर हकदक। अबारी तलक मेरी बि जु सास अटकी छै मिन बि सुखै सास ल्येनी। तौं सब्यून बाळा मने बबर्राट अर ज्यू चपळाट सर्रा पृथिक तौळ चिपाड़ण मा क्वे कमी नि छोड़ी छै पर आखिर मा बाळु बची ग्ये। बाळा मन अर ज्यू मा बचणे पूरी आसा रैन्दी पर हम छाँ कि तै बचण नि देणा। बस्ता किताब कंपुटर इन्टरनेट अर पता नि क्या क्या चीजन तै चिपाड़ी बणें देणा वी तैं कमांड पर चलणु वळु रोबोट, मशीन।

            लड्डू हर्या भर्यां ज्यूना डाळा लपलपा पात छ। जु सुरसुर्या बथों ससर्राट मा छुस्स छुस्स मजाक कर्दा हैंसदा, ना कि मोर्यां काठे अलमारी डवारों जन च्यूंच्याट कणाट । 

रचना - चन्द्रधर शर्मा  गुलेरी

अनुवाद - बलबीर राणा अडिग