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Wednesday, 13 May 2020

ईमानदार



यूं स्यता कुर्ता वळा, इनि ठगै चलि जाणा
ईमानदरि से कौ करार, करि चलि जाणा।

तौं उदघाटन करि, हमुल सुपन्यूं मैल चिंढिन
ईमानदार अपणा नौ ढुंगा, चढ़ै चिलि जाणा।

विकासे मुखड़ी पैलि बसग्याल मा पुती जान्द
सीधा सैणा  बाटा बी, पेऽर बणि  चलि जाणा।

ऐरां हमारा लाटोंन हमेस  मुच्छयाला   घच्वरैन
चकड़ैत हर्या भर्या बौण आग लगै चलि जाणा।

गारंटी रोजगार क्या ऐनी, दुकान्यूं  मा फांट लगि छ
तै रजिस्टर मा सर्री मवासी हाजरी लगै चलि जाणा।

कौ-कारिज मुश्किल हुयूं अब, धरम धाद नि लगणी
चट मंगणी पट ब्यौ  टेंटहौस  वळा करि  चलि जाणा।

समै की बात ह्वावो या  नयीं अकलै  समझ भैजी 
घर्या गढ़वळि छौड़ि सब्बी देसी बणि चलि जाणा।

क्वे मनख्योंन पाड़ खैणी, स्वाणु मुल्क बसेन
क्वे अब तौं  बाटों मा  ढुंगु फर्के  चलि  आणा।

र्निपट ह्वेकी मुख लुकायूं  जोन  पाड़ बटिन
सैरों बे पाड़ बचाणों उपदेश द्ये चलि जाणा।

स्यता - सफेद
पेऽर - रगड़ बगड़
बे - बटिन/ से

@ बलबीर राणा 'अड़िग' 

इनै सूण



1.
कति दिन बटिन
ब्वै लगीं रे, इनै सूंऽण दे बाबा
अर! वा, वोग लगणु रौ
कि ब्वै कखि रुकणु न बोलि द्ये,
पर ! बिदै बगत औंसू धाराऽ दगड़
वींऽन एक कुट्यारी थमैन
ल्ये बुबा, कुछ जन्त-जोड़ो काम ऐलु,
मिन सूणी तै सैरों मा
भिज्यां खर्च होन्दू
नयीं गृस्थी ब्वटण मा।

2.
पिताजीऽ न बोली
इनै सूंऽण ब्यटा टक लगै
खैल मा फस्ट औण से
भाग ल्येण मैत्व रखद
फस्ट औंणा चक्कर मा
जिन्दगी रेस ना बणाया लो।

3.
भैजिन बोलि
इनै सूंऽण रे, नाक धर्या
कामयाब होण चैन्द
इन न ह्वो
तिमला का तिमला खतैन
अर नांगी का नांगी दिख्येन।

4.
काकाऽन ब्वोली
ब्यटाराम, इनै सूण
मेरी बी दुन्यां खंयी च
देश विदेश तलक,
काम इन कर्यां
आँखि बी रै जौं
अर खौड़ बी नठि जौं।

5.
बस साब ! इना ही,
कब्बी क्वे इनै सुणान्दू
क्वै उनै बिंगान्दू
सिद्धान्तौं का बीच
जिन्दगी पिसीणै रैन्द
घिसणै रैन्द
कुछ सिद्ध ह्वै जान्दा
कुछौं कु बिगैर सिद्धऽक
अन्त  .............।

@ बलबीर सिंह राणा 'अड़िग' 

घाम



1.
परिकति का दगड़
परिकति कु बणि जान्द
गरीबो नांगू गात
इलै घाम बर्खा ठंडऽल
क्वे असर नि पड़द।

2.
ओंण दां कौंळु स्वाणु
सब्बी जाग
जाण दां सीळु निमाणु
सब्बी जाग
बीच मा करकरु, झरझरु
अर मरमरु
जाग-जागो कारण 
ये मा घामो क्वे दोष नि,
तनि आदिम बी।

3.
सर्ग थूकण मौल मुतण
भल नि होन्द
वा मवसी एक दिन
घाम लगि जान्द,
यनु मि ना ?
घामें जात्रा ब्वनी।

सर्ग थूकण मौल मुतण - रंगत्याट

@ बलबीर सिंह राणा 'अड़िग'

लॉकडौन मा माँजी संदूके याद



कुट्यारी-मुट्यारी, तुमड़ा-तुमड़योऽन
कुलणा-फुंगळा बक्सा, कुठारोऽन
मेजुळ ढैपुरा भितर भरयां छै अपार
चमन्द भरयूं रैन्द छै हमारु घरबार
पर ! ऐड़-चैड़ संकट मा, जु खड़ू रैन्दू
वा संकटमोचन मेरी माँजी सन्दूक होन्दू।

मामा पौणु ह्वो या बिन बुलयां मेमान
रैन्दू छै ते उन्द जर्वतौऽक सब सामान
चा चीनी, भेली, रैंदी छै घ्यू की माणी
कुछ रुप्यों कि गडव्ळी रैंदी छै थामी
ह्वे जान्दी छै बाबा मा जब लाचारी
तब माँ सन्दूक बचान्दू छै इज्जत हमारी।

वे काठाऽक बक्सा पर छै बड़ू ताळु
हुकम छै तै फर क्वै हाथ नि लगालु
पर! माँ तेरवीं पर खुली ग्ये छै बिचारु
बंटग्ये छै भै-भयात मा जति छै सारु
आज यु लौकडोन संकट कति बिथाणु
माँजी वा सन्दूक फिर भौत याद आणु।


तुमड़ा - बीज खाज रखने के लिए सूखी लौंकी के बर्तन
कुलणा-फुंगळा - रिंगाल के छोटे बड़े बर्तन/ढफरे
मेजुळ - दौ मंजिला
चमन्द - पूरा भरा हुआ
ऐड़-चैड - ऐन मौके पर

सुपन्यां


1. मजदूराऽ

ऐरां थौकि बदिन
पळभंग* निन्द ऐ जान्द
चौ मंजिल तलक 
सिमंटा तसला पौंछाण वळा तैं
ये वास्ता वीं तैं 
द्वी मंजिला बी सुपन्यां
नि आन्द।  

* पळभंग – बेसुध

2. गरीबाऽ

अजक्याल जर्रा तंगतगी ह्वयीं
छैं छ पर कुछ मजबूरी ह्वयीं
दिनेक ठैर ब्वटा सस्ता ह्वलू
फेर त्यारा सुपन्यां पूरा कर्लू। 

3. किसानाऽ

वा छतरु ल्येकि 
निकळी ऐंणाऽल*
कुटदा सुपन्यां बचाणों तैं
कि !
क्या पता कुछ तामि पाथी 
स्वेणा बची जों।

*ऐंणा - औले

@ बलबीर राणा 'अडिग' 

जिन्दगी


1.
जिन्दगी                               
फजलौ कौंळू
दु्फरो भडांग
छाडळकै स्येळि
ब्याखुनी सीऽलु
ह्वेगी रात
रैगी बात
या त च जिन्दगी।         2.
ब्याळि आज
आजऽक भ्वोळ
अर भ्वोळ!
नै फजल
नै किरण
ओंशे बूंद, स्यां।
इत्गा च जिन्दगी।
3.
बाळापने तड़म-तिड़ै
ज्वानी भड़म-भिड़ै
बुढापे थिड़म-थिड़ै
इत्गा कर्दी जिन्दगी।
4.
ब्याळी तैं रुण्यां
आज तैं खपोण्यां
भ्वोळ तै तरसौंण्या
या त कर्दी जिन्दगी
5.
जिन्दगी का
एकनस्या साज, बाज
जैन जति बिंगी
वति बजेन
वति छटकेन
कैन ताळ बणेंन
कैन उनि डंगड्येन।
6.
कर्मोंऽ स्याही
अर
सल्ले कलम से
दिनोंऽ पन्ना फर
लिख्यूं एक कलेन्डर च जिन्दगी।
 7.
जिन्दगी काॅपि
सब्बी भरदा
कुछ पन्ना रय्खड़-ब्यखड़
कुछ पन्ना सुन्दर स्वाणा
कुछ पढ़ण लेख ह्वे जान्द
कुछ छवडण लेख।
 8.
बसन्ते बहार
रुड़ी तड़तड़ाट
बसग्याळे तबराट्
ह्यून्दे ककड़ाट
छैः ऋतुओं चार
बारा मैनो बार
या जिन्दगी अन्वार।              9.
जिन्दगी
घड़ी पेन्डुलम
दिन रात चलद्,
गिरस्थि होर-पोर।
10.
धर्ती फर जीवन
संघर्षों वास्ता च
आराम त यख बटिन
जाणा बाद
ना चै किन बी
कन पड़ल
ये वास्ता
लग्यां रावा
जत्गा  देह घिस्येली
वत्गा चमक
वात्गा संचय
जु यख छुटलू।

@ Balbir Rana 'Adig'

दिवा जगणु रालो



भारत जय  ह्वालो विजै ह्वालो
तिरंगा यनु शान से लैरणु  रालो,
जब तलक वीर डट्यां सीमा  पर
देश सुखशान्ति दिवा जगणु रालो ।

अफूं लिख्दा वा जीवन संवीधान
मंगदा ज्वा बरदान मा बलिदान,
यना वीरों का अपर्ण सर्मपण पर 
भारत माँ  मुकुट  सजणु  रालो
देश खुशहाली दिवा जगणु रालो ।

कश्मीर बटिन कन्याकुमारी तक
मणिपुर बटिन कच्छभुज तलक,
क्षितिज पर लक्षमण रेखा बणि वा
जबतक करम अपणु निभाणु रालो
देश अमनचैन दिवा जगणु रालो ।

घाम नि तौं, नि छ बर्खा बत्वाणी 
जडडू बी होन्दू ह्वलु कैन जाणी, 
चालीस डिग्री प्लस माईनस फर
जब तलक वा ज्वानी खपाणु रालो
देश सुखशान्ति दिवा जगणु रालो ।

जब तक वीर माता की ममता 
जब तक वीर नारी की तपस्या,
भारत बिक्रम भारत भाल खातिर
आंसु बदिन तपर्ण करणु  रालो
देश सुखशान्ति दिवा जगणु रालो ।

@ अडिग