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Friday, 25 September 2020

उन्दारो ताळ



      पटवारी नोनी बरात जनि पार धार मा पौंछी वूंन सबत दिनी। तब्बी यख कैन धै लगै। ऐ दिदा सोंणु, बरात ऐग्ये रे पार धार मा। सोंणुन ब्वोली अरे गुसैं जी यख सब त्यार छ ना ? जी दिदा सब फिट-फोर ह्वेगी। राशन पाणी बणग्ये, चौक अर मुडि टेंट हौस मा बरित्यूँ बैठणु अर खाणु इन्तजाम होणु च। जरा पल ख्वाळा सुबदार साबा यख बटिन दन (कालीन) औण बाकी रयाँ। अरे दिदा तुम बी द्ये द्यावा सबत। हम बाकी व्योवस्ता छांट कर्दां।

          सोंणदासऽन बिेजेसारे डवोर कसि, लाकुड़ऽन द्वी तीन बार कुण्डळी पर मारिन, टंग टंग टंग। दगड़या मौलुदासऽन बि दमु पुडू मलासी, कन्दोटी गौळ डाळी, ह्वेग्यां सुरु।

          बिजेसारऽन - झेगु झेगु झेनन झेनन तू, झेनन तू झेनन। झेनन.................झेनन तू। झेगु - ता, ता ता झेगु ता, तुक झेगु तुक झेगु झेगु तुक........ बोली त। दगड़या दम्वाल -‘‘दिन, गिननि, दि, दिननि, दिन, गिननि, दिन गिननि, दिन गिन करि ताळ पुर्ये सबत दिनी।

           जनि बरात खौळ मा पौंछिन सब्बी बराती घराती बैन्ड मा एक फोड़म फौड़ छाँ कना। क्या बजणु क्या नाचणा पता नि ! मथि बटिन डी जे कनफ्वड़ू घ्याळ। दमु अर बिजेसार द्वी स्वैण मैंसैं झंग तंग झंग तंग जनि बागा बीच स्याळ। यीं हल्ला रौळी मा ना मंगळाचार सुणेणु छै ना मंगलेरों गीत। बस सर्री बराती मा छय्याँ छै त डीजे, झांझी, छकना छोरी, चैत्वाळी अर पंजाबी रौक।

          बर्यती घर्यती द्वी औजी भायोन ब्बी बिजेसार अर दमु तैं मुड़ी पुंगड़ा मा लग्यां टेंट हौंसा एक कूणा मा धरिन अर चलग्यां खाण-पीणा जुगाड़ मा।

          अब बिजेसारे जोड़ी इत्गा भीडा़ बीच यकुलकार लाचार। जन काळा बण मा छुंटयूं बखुरो। ना चिल्लोट मचै सकदा न चुप रयेन्दू। यनु लगणु छै जन या बैन्ड अर डीजे वूंकि खळवड़ी तैं डयोरा जनि गरुड़ ह्वो चुंडणा। सर्रा गात चींरी चिमराट होणी छै। पर समै समै की बात च बगत बगत कु फैर। आज जमानु तौं कु छै। क्वो पुछणु बिजेसार अर दमु तैं। जतिगा बड़ू घ्याळ वतिगा बड़ी रौंस उल्लास। 

          पौंणा ढवोलन ब्वली यार भैजी कन जमानु एग्ये, वा बि कन समै छै जब सबसे पैली पिठैं हमु पर लगदी छै। सत्कार होन्दू छै। मंगलाचरण अर मांगळ मा हम, झें .....गु  झेगा ऽऽ, झेगा झेगा ऽ ऽ ता झें ता झे, करि ताळ देन्दा छाँ। दगड़ मा मसकू भुला बिगरैली ताण मिसान्दू छै। हे भगवान ! आज या कुकुरगता ! अर बच्याण बच्याण तैका आँख्यों मा तर्रबर गंगा जमुना बगण लगिन। चारों स्वेण मैंसों कि आँखी डबळाण बठिन। जन तौं तैं कैकि बरात ना ह्वो। बल्की ? कैकी डांडी उठणी ह्वो। 

          तबि घराती बिजेसारऽन सास बटौरी। आँखा पूंजिन। अर बोली भैजी चुप रावा। क्या कन। दुःख  अपणु म्वनो नि छन। बल च्वोर तैं अपणी नि, वे घौर वळें चिन्ता च होणी जै घौर वीतें कुछ नि मिली। बल मि त हैका घौर फोड़ी खै ल्योला पर यीं घौर वळा क्या खैल्या। मितै बि तनि दुख च। हमुन त म्वनै च। आज नि त भ्वोळ। पर ! अफसोस यूँ मनख्यूँ द्वारा चरितर पर छ। देखी तुमुन मास्तो तैं। सोशियल मिडीया, पत्रिकाओं अर गोष्ठियां मा कन रैन्दा पुजणा ? जन हमारु ही दोष लग्यूं ह्वो यूँ मवसियों पर। अर यख द्याखा। हम दूध मा पड़यां जन माखु ह्वयां।

          जख ब्यौ चखळ-पखळ हर्ष उल्लास छै वखि बिजेसार जोड़ी अपणा उन्दारो ताळ, झेमा झे ऽ..ऽ, झेऽ नन् तक, झे नन् तक, तैं सुमिरण करि छाळा पौंछणे तैयारी छाँ कना। 

 

@ बलबीर राणा ‘अडिग’

 

Wednesday, 23 September 2020

गुसैं जी (बाळ कानी)

             मनीसा अर तनीसा इस्कूले छुट्टी मा घौर अयां छाँ। नोनिन्यूँ लकार, ददि दगड़ भैर-भितर डुखरा-पुंगड़ा दगड़ जान्दा छाँ। एक दिन तौन ददी तै ब्वली ददी हमु तैं किसाणों मैत्व बतौं हमारा गुरुजिन ब्वोलि कि किसाणों मैत्व गौं बटिन सीखीं अयाँ। नतिणों लकार देखी ददिन एक कानी  सुणे।

      बुबा एक गुसैं जी (गुसाईं) छाया, गुसैंजी गौं मा बड़ा जिमदार छाँ, सम्पूर्ण गिरस्थ। छकी जमीन जैजाद, नाज-पाणी, गाजी-पाती। गिरस्थी होर प्रमुख सदस्यों मा पूसु कुकुर अर मंगशीरी बिराळी भैर भितरा पैरादार। कूड़ी खदरा मा चैता घिंदुड़ी अर पुंगड़ा मा बैसाखु मूसौऽ परिवार बी साजीदार छै। गुसैं जी जति बड़ा जिमदार छाँ वति कर्म ज्यू का बड़ा मनखी, जीवन शूत्र छै कि सब्बी जीव नमाण यीं जिमदरी पर निर्भर छाँ ये वास्ता कैतें तिराणु नि। जु बि औन्दू आशा पर आन्दू मेरा घौर बटिन क्वे निराश नि होणु चैंद।

      मालिक का यीं सत ब्यौहार से मंगशीरी बिराळी तऽऽ बिल्कुल असंगल्या ह्वेगी, घ्यू दूध खै घळघळकार। भितर बैसाखु मूसाऽ परिवारे चखळपखळ। पूसु कुकुर चंट चालाक पर मालिको हुकम द्यो वचन मानी घुर-घुर करि बैठयूँ रैंद। खौळ घाम डाळी नाज पर चैता घिंदुड़ी मवसी सदानी बग्वाळ मणादी।

      जब कब्बी मंगशीरी अर पूसू मालिक मा बैसाखु मूसैऽ अर चैता घिंदुड़ी मवसी सिकैत कर्दा त गुसैं जी ब्वल्दा चुप रा खाण द्या जु खाणु अपणु भाग कु खाणु मेरु क्या खाणु। यीं बात सूणी बैसाखु मूसा अर चैता घिंदुड़ी परिवार दुर्वा आशीष देंदा कि यीं भग्यानों घौर जुग तलक सदानी अन्न धन से भरयूँ रौ। गुसैं घौर मा कब्बी अन्न धनै कमी नि ह्वेन अर सब्यों परिवार पलणु रयूँ।

      ताऽऽ ..... बाबू गुसैं जी सत से अज्यूं तक गुसैं मवसी फलणी फूलणी छै, गौं क्या भैर सैर मा बी।  मनीसा अर तनीसाऽन जिज्ञासा से बोली ददी कु छाँ यना सत पुरुष गुसैं जी ? आँख्यूँ मा आँसू डबळे ददिन अटकी बोली बुबा तेरु ददा जमन सिंह गुसांई जी। अब द्वि बैण्यां गर्व कना छाँ अपणा दादा जी बसुदेवकुटंबकम कर्म पर। द्वीयों बाळा मनऽल सौं खैन कि वा बी अपणु जीवन यी शूत्र पर ज्यूला।


@ बलबीर राणा ‘अडिग’

Monday, 21 September 2020

गीत (गृहलक्ष्मी)



ज्यू धक धक कनू  

धकध्याणु

मन हिर हिर कनू 

हिराणु 

तू वरदान छै या किस्मत 

सवाल अफूं तैं बिंगाणू ऊँssss....

ज्यू धक धक कनू ..ssss...


वा जून सी मुखड़ी 

वा फूल सी पांखुड़ी 

ऐगे बंसत बौडी 

रुखड़ा जीवन मा दौड़ी  ई ई sss..

ज्यू धक धक कनूss ......


1. अंतरा 

धन धान्य ह्वेगी 

मेरु भाग जगिगी 

तैला मुलकू कु  घाम 

मेरा शीला घोर ऐगी ।


तू मेरी चखुली 

मि तेरु चखुला

घुघति घुघुता बणिsss

माया का बण उडुला....आ आ sss

ज्यू धक धक कनूss .....


2. अंतरा

तौं पैजब्यूँ कु छमड़ाट् 

चूड़ियों कु खमड़ाट 

खिलपत ह्वेगी मेरु घोर

लगि खुशियूँ  भिभड़ाट् 


वा चमकदी दंतुड़ी 

वा हैंसदी नथुळी

दमकदी बिंदुली sss 

जगमग मेरी डंडयळी  ...ई ई ssss

ज्यू धक धक कनूss ......


अंतरा 3. 

ऋतु बारा मैना

मेरा घोर ऐना

प्रीत की गागर भौरीं 

चखळ पखळ कैरी गेना


अरे ऐ विधि विधाता 

कृपा दृष्टि राख्या

कांडा नि चुभिन सीं पर

मेरी ग्रहलक्ष्मी ख्याल राख्या..आ आ sss


ज्यू धक धक कनू  धकध्याणु

मन हिर हिर कनू हिराणु 

तू वरदान छै या किस्मत 

ये स्वाल अफूं तैं बिंगाणू ऊँssss....

ज्यू धक धक कनू ..ssss...


@ बलबीर राणा अड़िग

पराज



भैजी अब किलै नि दिख्येणी

घिन्दुड़ी मेरा छाजा

ना जाण कै मुल्क चलिग्ये

छौड़ी कि वा आज।


भली मनखी लगु छै भैजी

रैन्दी छै आस पास

करदी छै उच्छयदी वा कब्बी

खौळा धैर्यों नाज। 


नखरु नि लग्दु छै भैजी

तैकु वा उच्छयाद

भैजी अब किलै नि ........


फुर्र फुर्र नचदी छै भैजी

बैठी की तिबारी 

रैन्दी छै फ़फ़राट कनि 

छाजा चौक सगवाड़ी


अब नि सुण्येन्दी वीं की 

चुँ चूँ वळि बाज

भैजी अब किलै.................


थौ खै बैठ जर्रा सी भुला

बतान्दू यीं कु राज

किलै नि दिख्येणी घिन्दुड़ी

बिगान्दू त्वे तैं आज। 


भुला जब नि रैन्दू कखि 

ज्येणु कु ढंग ढाळ

तब नि लगदु भुला 

कै फर पराज।


इलै नि दिखेणी भुला

घिन्दुड़ी तेरा छाज।


दुश्मन बणिन मनखी 

वीं कु घ्वोळ उजाड़ी

कूड़ों मा लेंटर पड़ी की

तैन रौणे जाग नि पायी। 




अपणा प्वथल्यूँ का बाना 

तैन छोड़ी साज बाज

इलै नि दिखैणी भुला

घिन्दुड़ी हमारा छाजा। 


नि रायी खादर धूर्पळू 

पठाली दार बांस 

कीड़ा रसेंन खाद ल निरपट

खाणु पडिं तरास।


भुखन मोरिन कुछ 

कुछ चल्गये दूर दराज

इलै नि दिखैन्दी भुला

घिन्दुड़ी हमारा छाजा। 


भैजी अब किलै नि ........

भुला इलै नि .......


*शब्दार्थ*

छाज- छज्जा

लगु - लगो, लगाव

नाज - अनाज

पराज - खुद / याद

खादर - आळो /आला (मकान की दिवालो पर वस्तुओं और पक्षियों के लिए बनाए गए स्थान)

दार बांस - मकान में लगने वाली लकड़ी की बल्लियां (बल्लियों बाहरी छोरों में बची जगह पर भी गौरया अपना घौंसला बनाती थी।)


@ बलबीर राणा *अड़िग*

Saturday, 19 September 2020

पितरें अग्याळ




    बिगरैलू संजोग ही छै कि मनौड़ी परिवारा तीन पितरें तीथ एकी छै, चर्तुदशी। पिताजी, दादा अर बुढ्या दादी। दिवाकर अर प्रभाकर यीं पीड़िऽक हर्ताकर्ता। बड़ू भै दिवाकर आर्युवेद कम्पोन्डर, बड़ा भगत आदिम, निमाणा, व्यौहार कुशल। सदानी घौरा नजीक पोस्टिेड रयां। सबसे बड़ू गुण जनते स्वास्थ्य सेवा। हर बगत अपणा पैंसौं से फर्स्टऐडो थैलु दगड़ रखदा। जेन जखीमु बोली दवे देन्दा अर पथ्य समझान्दा। दगड़ मा पिस्तरी काम जजमानी अर सैरुल समाळी छै। कखि बि ह्वो एकी रैबार पर जजमाना घौर पौंछी जान्दा छाँ।

    दुसरु वळु भै प्रभाकर डिग्राी पढ़यूं आई टी प्रोफिशन से बम्बे मल्टीनेशनल कम्पनी कर्मचारी। चौं तर्फां जमाने हर्क-फर्क। सोशियल मिडीयो स्टार, फेसबुक, यू टयूब, इस्टाग्राम, यू टयूटर सब्बी जगा एक्टिव भागीदारी। पितृ पक्ष सुरु होण से पैली दिवाकरन फोन करि यार भुला प्रभा यीं साल तु श्राद्धों मा घौर नि सकलु त तखि अपणा डयार मा सुक्ष्म पुज्ये कैर दियाँ। बाकी मि त घौर मु कर्दू ही छै। प्रभाकरन बोली भैजी ठिक च यीं साला श्राद्धों तैं मि यादगगार बणे द्यूला आप चिन्ता न कैरा, पितरों तै क्वी सिकैत कु मौका नि मिल्लू। आप मुबेल पर देख लियां।

    प्रभाकरन श्राद्ध सुरु होण से पैली सब्बी पित्रों फोटो कठ्ठा करि, गुगल बाबा से पितृ भक्ति का कूट अर स्लोगन निकाळी। फसक्लास पोस्टर डिजाइन कैर शानदार विडीयों बणें यू टयूब चैनल पर उपलोड करि। आखिर मा चैनल तै लाईक सियर अर सब्सक्राईब  कर्यां बी ल्येखी। अर घंटी बजोण ना भुल्यां त पैली। चर्तुदशी तीथ औण तक लाखों व्यूज, हजारों सब्सक्राईबर दगड़ चैनल च्वाँ च्वाँ। मनौड़ी परिवारा पितर घौर-घौर पौंछिन।

    तिथी दिन दिवाकर न विधीविधान से पितृ प्रसाद बणैंन, काखडी, मुंगरी, आमनी सबकुछ पितृों तै चढैन, तर्पण दिनी। सर्रा मनौड़ी ख्वाळा तैं पितृ भौज। अर पितरों तै स्येळा सिमार  सिवेन। ब्वखुन्दा दिवाकरन प्रभाकर तैं फोन करि, भुला प्रभा आज कन रैन श्राद्ध । प्रभाकर भैजी ठि...ठि...ठिक भैजी। सौरी भैजी आज एक जरुरी लाईव प्रोग्राम हौण से मि निचन्त भूलीग्यों अर बच्चोंन होटल बटिन खाणु मगैंन। दिवाकरन अच्छा करि फोन काटी। स्वचणु रौं कि कन जमानु ऐगे भगवान अद्दा मैना से पितर फोन मा सेलीब्रटी बण्यां रयां पर आज तीथ पर एक गफ्फा अन्ने अग्याळ नि पैन, धन हो विकास।

ॐ नमो व:पितरो रसाय नमो व:पितर:शोषाय नमो व:पितरो जीवाय नमो व:पितर:स्वधायै नमो व:पितरो घोराय नमो व:पितर:पितरो नमो नमो मम जलअंजलीमगृहाण पितरो वास आधत।।

@ बलबीर राणा अडिग


Friday, 18 September 2020

नि होण्यां पिरेम



     गवंरा देवी* उल्टी बदिन सर्री धर्ती स्येति ह्वेगी छै अर मथिबटिन माँ गंवरा एक वक्का-वक लगीं छै जुळका मा जुळका फरौंण पर। एक बंकापुरी। यनु लगणु छै सीं कति दिने बदहजमी थामी छै जु आज सब्बी उल्टी करि हल्की होण चाणि ह्वो। सुबेर बटिन छा ढळकी तलक तीन फिट से मथि थौंर्यूं छै ह्यूँ। डाळि बोटियां कबैर तलक त मैदान मा डट्यां छाँ पर अब तौन बी हार मानी मुंड झुक्याली छै। बाटा घाटा एक रमथमकार सैंणा सपाट, हाँ धारा नाळा अर गदरों अज्यूं हिम्मत धरिं छै जोन अपणी औनार बचयीं छै। पौन पंछी जडुन बिबलाणा छाँ, वूंका बिबलाट से बगत-बगत पर डालौं बटिन फताक फताक ह्यूं बड़ा थ्वपका भुयां झड़दा। पंछियूँ मा घिंदुड़ि ही इन छै जु खिलपत ह्वे हौंसणी छै किलैकी वींकु घौर आज ह्यूँ बदिन बच्यूं छै। वा बिच बिच मा कूड़ा छाँत से र्फफराट करि भैर औन्दी अर कै डाळी हियूं झाडी चट भितर ठिया पौंछ जान्दी जन हौरि प्वथलौं तैं ब्वनि हो कि मि बी दिलैर छौं।

आज सोबन सिंह रौत (स्वबनु) ननि याद कन ममकोट जयूं छै ननि भिज्यां बुड्या ह्वेगी छै ना जाण अब अग्ने दर्शन ह्वलू, कि ना। ममकोट जर्रा डानो मुल्क छै, ये वास्ता तख बर्फबारी जादा होन्दी छै। दिन मा भात खाणा बाद स्वबनुल मामी तैं बोलि मामी जान्दू छौं जति देर कर्लू बाटू वति जादा मुश्किल ह्वे जैलू द्यो कि बि बिद्दा होणे मनसा नि दिखणी। उन बि छुट्टी कमति छ घौरपुन अज्यूं भिज्यां काम निबटाणु रयुं। तुम जणदा छाँ मैता अर छुट्टी दिन पूसा मैनों जन घाम अब्बी अयूं अर अग्वणि* चलग्ये। उन बि पराबटी नौकरी छुट्टी प्वथलौं जन गौळु, मामिऽल बि जिद्द नि करि स्या बि समझणी छै कि काम धाम यीं झड़द्यो* मा क्या होण पर भाण्जा परिवार दगड़ घौर अयां त झड़द्यो मजा गरम रजै।

      सोबनु नानी उबरा गेन, ननि घर्या ढ्यपरां ऊनी म्वटा चुटका* भितर अंग्रेजी आठ हुयीं छै दिसाणा बगल मा चुलाणाउन्द बाँजा लखड़ें गरगरी आग जगणी छै। सोबनुल ढक्याणा भैर बटिन ही खुट्टा बानी सेवा लगे, ननि मि जान्दू छौं अपणु ख्याळ रख्या। ननि सटपट खडि उठि, ओ म्यारा सोबनु आग ताप। बुबा ख्याल त अब मथि वळु धर्लु उन्दारो बाटू लग्यूं, न जाण कखमु राशन पाणी निमणी जावूं, तू तै सेरों मा नालोडें* भलि सै-समाळ कर्यां। अर अपणि ब्वै तैं ब्वल्या पंचमी मा जरुर अयां तेरा बाल बच्चा उन्द ल्यी जाणा बाद तैन मैत नि देखी। क्या कन बुबा ब्वारी ल्ये किन बी वींकी आफद आतुरी वीं पर ही रै। पर ! नयुं जमानु च लाटा तुमुन बी बाल बच्चा पढौंणे च, भल करि त्वेन, नि राला हमारा चारे जिन्दगी भर यूँ भैंस बखरों पिछने। ननिल चैंठि पर हाथ लगै भुक्की प्येनी अर ब्वलाण ब्वलाण रूण बैठिन।

सोबनुल ममकोट मा सब्यूँ दगड़ बिदै लिनी अर छतरू वारी निकलग्यूँ घौरे तर्फां। सात आठ किलोमीटर बँकापुरी* चार फुट्या ह्यूँ मा हिटद-हिटद थौक बि लगीं छै अर ठंडै बदिन खुट्टा बि टटकारिगा छी, उन त फौजी गमबूट अर कोट पैरयूं छै पर मैनस पाँच डिग्री मा हाड़ मासो शरील हिकमत से गरों होण लगी छै। वा गर्जम्-गुरजे ह्यूँ हराणे कोसिस कनु छै कि एक किलोमीटर बाद द्वारखाळा मरोड़ा औण वळु छै तखि कैका मरुड़ा मा आग तापी घौर तक पौंछणु तौ ल्यूला।

द्वारखाळ से पैली मज्याणी धार मा पौंछिन्दा तैन जर्रा रुकी रमथमकार हुयीं धर्ती मा बाटू जैजा ल्येनी त तैकि नजर धारऽक ठिक तौळ धुंवा पर टीकिन। मन मा स्वचणु छै कि यख त पैली क्वे ग्वोठ साळि नि छै, कै मवासी ह्वली यु साळि*। उन बी यीं बाटा वा आठ साल बाद औणु छै, घौर गौं मा बि जनसंख्या बड़ण से लोग बाग गौं से भैरे तर्फां बड़ण लग्यां छाँ। सौजि-सौजि मरुड़ा जगा पक्का मकान अर मरुड़ा भैर जंगला तर्फां सर्कण लग्यां छाँ। अंदाज लगायी कि यु जगा मज्याणी गौं का फत्ते ल्वारे जमीने सींत पर छै अर नोना बाळा बि तौंका छकी छै सैद तौंका नोना सर्की ह्वला यीं तर्फां ।

धार होण से खूब रौंत्येळी छै वा जाग। तख बटिन पल्ला धारा सब्बी गौं टक दिखंन्दा छाँ। चला जैकि बि साळि ह्वो बस्ती त छैं छ क्वे रिख बाग थोड़ि छ ! कौन सा मिन तख ठिकाणु बणोंण, यखमु ही जर्रा आग तापी अग्ने सर्कणु तौ लियीं जों। सोंबनु साळी भैर पौंछिन।

साळी ड्वार ढक्यां छाँ वेंन भैर बटिन धै लगेन, ऐ नालडौ, छौं क्वे भितर, भितर बटिन क्वे प्रतिक्रिया नि ह्वेन, फेर ड्वारा संगल खड़के बोलि अरे भितर वलों भितर ऐ जौं। तबारी एक छः सात साले गोरी उजळी नोनिल ड्वार ख्वळि, मुख पुतलण्यां गात पर एक झगुली औनार कुछ जाणी जन लगणी। नोनिल बोलि तुम क्वो छाँ ? बाबा भितर आण ध्ये मितें भिज्यां जड्डू लगिग्ये। तबारी भितर बटिन एक जनानी आवाज ऐ, आवा आवा भितर ऐ जावा। क्व ह्वला ? जनानिन कै बच्चा तैं डांटिं फुंड सौर रे, तै चुलाणा उंद् खुट्टा न क्वोच। क्वे औणु तौं तैं बैठण ध्ये।

सोबनुल छतरु बंद करि मोरि मा बूटों बर्फ झाड़ी बूट ख्वली अर भितर चलग्यूं। साळी भितर अन्ध्यारू ह्वयूं छै ठन्डा बदिन ड्वार म्वोर सब चम्पत बुज्यां छाँ, भितर गव्वोरु भैंसों घंडुळा आवाज दगड़ गौंत म्वोळे चिराण औणी छै। हाँ ग्वोठ* गरम त खूब छै ह्वईं। जनानिन ब्वली आवा बैठा आग तापा, कख बटिन छाँ औणा ये बँकापुरी ह्यूँ मा? मथि पज्याणी गौं ममकोट छै जयूँ ननी याद कन, ननि बुड्यां ह्वेगी मिन बोली दर्शन कर्योला, सोबनुल जबाब दिनी। क्या ममकोट वलूँ बल्द् नि छाँ बाँधयाँ जु इन मौसम मा बाटा लगिन?

जनानी मुख नि दिखेंणु छै पर सोबनु तैकि बाज भलिऽकी पच्छ्याणणु छै। तैकि बाज बि जनानिन पच्छयाणिली छै पर जननी जात शर्मयाळी फट नौं गाड़ी नि ब्वलि साकि। सोबन सिंगन यकीन कना वास्ता बाना मारि छवटि नोनी तैं बोली बेटा तै ड्वार खोल जरा धुंवा होणु भिज्यां। नोनिन झट सालि ड्वार खोली, उज्जयलु भक करि भितर ऐ, जन उज्यळु तें बि भैर जड्डू ह्वो लगणु। साळि भितर अँध्यारु पर्दा उठि।

जनि जनानी अर सोबनी नजर मिली त द्वियाँ हकदक ! एक टक एक हैका मुख बटिन आँखा ना हटो। आँख्योंऽन बि किलै हटण छै, तौं आँख्योंन न जाण कति स्वेणा सुपन्यां देख्यां छाँ। जैकि गवै वीं धर्ती छीणा कूणा आज बि माया अदालत मा निर्भे ह्वे दे सकदा। घामा दिनों बांजों छैल, ह्यून्दा तड़तड़ा गैठा, मधुमासा बुराँसी फूल, बैसाखा मैना काफल अर चैमासे घीड़ मा उड्यार आसरौ, कैतें बि पूछ सकदा छाँ। घुघती, न्योळी, हिलांस आज तौं विजातीय पिरेमियों कथा एक सांस मा सुणे सकदा छाँ। ब...ब.. बसंती यु तेरु घौर छ क्या ? सोबनुऽल हकलै ब्वलि। बंसतिन मुंड हिलै जबाब दिनी।

जब काफी देर तलक द्वियूं प्वतळि झपकोणु तैयार नि छाँ त छव्टी नोनिल पैल करि, माँ ड्वार बंद कैर दियूं ? हमारा ग्वरुं तैं स्येळ* लगग्ये। तबारी तलक भितर खूब स्येळिन भरीं छै। नोनिल ड्वार ढकिन। अब द्वियाँ गिचू चुप। क्वे कुछ न ब्वलों, ना छुंवी ना बात। सोबन चुपचाप आग मा जुराब सू सुखाणु लगिन अर बसंती आगे झोळ मा तैका हाथ देखणी रेंन। वा हाथ आज कत्गा परै अर अजाण छाँ लगणा, कब्बी यूँ हाथ तैका अपणा जन छाँ, तौं हाथों वीं स्पर्श मैसूस करि तैकु गात सर्सराण लगीं छै।

एक चारेक सालो नोनू चुलाणा बगल मा अजाणा मनखी देखी चुपचाप बैठयूं छै, निथर इनि उमरा नोना भ्ज्यिां चुल्खुन्दा होन्दन। द्वी नोनि ह्वो नोना चुलाणा बगल दिसाण मा सियां छाँ ।

एक दां फिर वीं छव्टी नोनी चुप्पी त्वड़ी। ऐ माँ यूँ तैं चा त बणें दये। सोबनुल जबाब दिनी ना बा ना मि चाय नि पैन्दू। बसंतिन मने-मन ब्वली चा हाथ क्या गाते बि प्येन्दा पर जात पाते कूड़ी नि फुक्येन्दी। स्वोच से भैर ऐ वींन बेटी तैं वोली बाबा बिठ लोग हमारा यखे चा नि प्येन्दा, अर अटगि-अटगी सोबनु तैं कुशल पूछी, भ..भ.. भल च तुमुऽ, तुमारा बाल बच्चा ? आठ साल पैल्यों ‘तू’ आज तुम बणिग्ये छै। सोबनुऽल उनि अटगि-अटगी जबाब दिनी कुशल छ ब.. बसी..। हां बसंती तैं प्यार से वा बसी त बुलान्दू छै बाळापन से। अब ना ब्वला बसी,  बसी त मल्यौ डार दगड़ पर्यां मुल्क उडिग्ये, बसी ध्वीड़ बणि जात बिरादरी शिकार्योऽन मार्याली। यख बसी ना बिजू लाले कज्याण बसंती देवी छ।  

सोबन सिंगल क्वे जबाब नि दिनी जादा छुंवि बत लगै वा अतीत तैं जगाण नि चाणू छै। अतीत जगि वर्तमान नि ह्वे सकदू, न वींमा इत्गा हिकमत छै अर ना नीति कि बसंती तैं दियूं वचन निभै साकू। अतीत तैं साकार कन परालै बर्त जन लगणु छै, परालै बर्त पर गाड़ पार कने सामर्थ नि होन्दी।

आज एक गदरु द्वी फागों मा बटिं कब्बी ना मिलण वळि धराओं मा बगण लगी छै, अब एक रस्ता द्वी फाड़ ह्वै जात बिरादरी हाईवे दगड़ मिलग्ये छै। इन ह्वावो कि पुराणी छुंवीं पतौळी यादों कुट्यारी खुली जौं अर वीं पुटगा बटिन लाल किरमुला निकली होणी खाणी गिरस्थी पर चिपटी जौं, यखमु बटिन जल्दी जाण मा ही भले च। वींन थैला बटिन द्वी बिस्कुटा पैकेट अर मुठ्ठी भौरीं टॉफी निकाली छवटा नौनयालों हाथ पर धरिन, जुत्ता पैरी भैर निकलग्यूँ। बसंती मुंडौ पल्ला समाळी पिछने बटिन भैर ऐन।

भैर अब बर्फ गिरण बंद ह्वेगये छै व्यखुनी पिंगळा घामल ह्यूँ चूळा कांठी स्वोनु जन चमकणी छै। प्वथ्ला अपणा घ्वोळ छोड़ि उंड फुन्ड फर्फराट कन लगिन कि कखी कुछ गाळु मिल जों घ्वलणा बाळा तैं। पल्ली पार हरसिंगा खर्के तर्फां अन्वाळ* वखरों तैं ल्ये-ल्ये करि हिंसर किन्गोड़ा कांडा काटी देणा छाँ, भुऽखा बखरों अर चिनखों मिम्याट से यनु लगणु छै कि कखि बाग गोठ मा पड़िग्ये ह्वलु। यूँ अन्वाळों तैं बर्खा झड़द्यो कुछ नि बिणान्द जीव पाल्यूं सत वूं का पुटगें धीत से ही कमेन्दू। “जब खालु ख्वेरी तब खयेलि थ्वैरी”।

सोबनु तै साळी बटिन चाक्काचूर दस पन्द्रा कदम घौरा बाटा उन्दार दौड़ि फिर एक दां पिछने मुड़िन, बसंती साळी डिस्वाळ मा चुप खड़ि द्खणी छै अर वींकि नोनी हाथ हिलोणि छैं, तैंन बि हाथ हिलै अर मुंड खाड़ डाळी अग्ने बाटा लगग्यों। बसंती हालतों बिष्लेषण अर वूं दिनों याद मा सोबनु कमांड दियूँ जन रोबोट बाटा लगिन। 

गोरी चिट्टी जून जन गोल मुखड़ी उनि छै पर गळौड़यां भितर चलग्यां, लौंचि ज्वानी भरयूँ गात डिलडौल अब खंतणो मा टंगी डमी जन दिखणी छै। घ्वीड़ काखड़ जन चंचळ चित थीर गिरस्थ्या स्वेणी बणग्ये छै। गोल भंरी छत्ती न जाण कख बुस्येग्ये छै। पच्चीसे उमर मा चार लड़क्वाव। गरीबी खिखताट मा जीवन तांगे ताण लगाणु छै। बसंती जीवन न फूलों हार छै न कांडों दिसाण। दया से जादा अपणी मर्दांगनी पर सरम छै औंणी। दोष कैकु छै ? समै, समाज या द्वीयूँ कु। कौंळी उमरा सौं करार तैं क्या जीवनो बाटु पुर्येणु हक नि छ ? हक छै त हमारा पिरेम तैं किलै नि मिली। पुराणा पिरेमे तपण मा शरील यति गर्म ह्वेगी कि वा नि चिताणु छै कि ह्यूँ मा हिटणु।   

अग्ने बाटोऽक ह्यूँ बखरों खुरड़ों से कटि सौंग ह्वेग्ये छै अर वा यादों भौंर से भैर औणें कोसिस कनु छै। पर ! बित्यां दिन एक-एक करि चलचित्र माफिक समणी दिखेणा छाँ।

सोबनु अर बसंती एकी गौं का छाँ, गौं बीच मा एक गदनू छै, जात बिरादरी बागा बोर्डंर। वलि वार ठाकुर बामणे बस्ती, पल्ली पार हरिजन बस्ती। द्वीयूं सार, जंगळ, मरुड़ा कठ्ठी छाँ। वोड़ संतरा सब्यूं कठ्ठा। सब्यूं गौरु बखरा इकठ्ठा चरदा छाँ। द्वी बचपन से घौर बण इस्कूल का दगड़या। बाळापन मा कागजे नाव बगोण अर पिठ्ठु ख्योलण से सुरु ह्वे दोस्ती कबैर ज्वानी पैली सीढ़ी मा पौंछी डाळों छैल अर पाखों पिछने बैठण बठिन पता नि चलि।

द्वीयूं सल्ला इस्कूल मा ही ह्वे जान्दी छै, इस्कूल से धनतुरन ऐ चट घास लखड़ा बाना बण चलि जान्दा, वा मुरुली पर नरेन्द्र सिंह नेगीजी कु गीत बजान्दू, क्वो भग्यान ह्वलो डांडियूं मा इनी भोलि बंसुरी बजाणु, बसंती दगड़ गुणगुणादी ह्वलु क्वी बिचारु मि जनु नखर्याली बांद रिझाणु। द्वियां न जाण कबैर तलक कृष्ण गोपी बणि माया संगसार मा ख्वयां रैन्दा। कैका बुबो घास लखड़ू, गौरु बखरा। अन्ध्यारा होण पर सोबनी एक ठंगरु कान्धी रखद अर बसंती द्वी पूळी घासेऽ पीठ लगै अपणा घौर चली जान्द। बल कैन ठिक ब्वली कि प्यार अंधू होन्दू। अब इत्गा त यूं कौंळा मायादार बिंगीग्ये छै कि हम विजातीय छाँ हमारु एक होण मुश्कित छ, यु पिरेम नि होण्यां पिरेम छ पर माये माया कख छौडण वळि।

उन उमर इत्गा रसिक होणे नि ऐ छै, किशोरपना बाद शरील मा बदलौं होण पर न जाण कनि अगासमात्री लगलु बणग्यां। द्वीयूँ तैं पता नि चली। 

ब्वलदन ईस्क मुस्क जादा दिन तक नि छिपदू। ह्यूँ मा हग्यों एक दिन सै ह्वे जान्द। दुन्यें नजर यूँ नवाण मायादारों पर लगिन। सर्रा इलाका मा सोबनी अर बसंती बांदा किस्सा लगण लगिन। एक दिन गौं सरपंचजिऽन सोबनी बुबा तैं बोली यार गजे सिंह मि यु क्या सुणु, नस अब्बी खड़ी नि ह्वेन अर तड़तड़ाट सुरु ह्वेगी। अपणा नोनू ब्यौ कैर भाई झट, निथर क्वी अभ्योग लगलू त हम गौं इलाका मा कैतैं मुख दिखोण लेख नि रैला, नाक कटि जाली। अरे तै मास्ता तैं समझो जात बिरादरी क्या होन्दी। मुख बी बखी मारी जान्द जु सुंघण लेख होन्द। बच्चू ल्वार तैं मिन समझाली।

तै दिन बटिन द्वीयूं पर घौर मु सगत हिदैत मिली अर पैरा लगण लगिन। पिताजिन कच्चा लंगोट कु परिणाम ढंग से बिंगेन। सोबनु केवल हाँ मा मुंड हिलाण रयूं। वीं साल बारा पास कना बाद गजे सिंगल सोबन तैं गौं का एक भै दगड़ दिल्ली पठ्यांणु बिचार करि, घौर बटिन मुख लुकयूँ रैलु त कुछ दिन मा तै छौरी रुप कु मौ टुटी जालु।  

दिल्ली जाण से पैली वा जंत जोड़ करि बसंती से मिली अर वींतैं बिस्वास दिलैं कि खूब मेनत करि दिल्ली मा बड़ी नौकरी लगलु अर एक दिन त्वै तैं दिल्ली ल्ही जैलु सदानी वास्ता। फिर यीं जात पाता गौं मुख कब्बी नि दय्खुला। चार घंटा तक द्वीयां गैठा ढांगा पिछने जीवन का स्वेणा बुणण रयाँ। बसंतिन जाण बगत ब्वनी छै कि मि तेरु बाटू द्यखलु अर वा तैका हाथों भुक्की ल्ये बचन देणु रो कि जरुर ल्ही जैलु। तैन सीं गौरी मुखड़ी का चैंठी तिल से रुवांसु ह्वे बिदै लिनी।

दिल्ली जाणा बाद कुछ मैना त वा उनि ढपकणु रौ फिर एक कम्पनी मा नौकरी कन बैठग्यूं अर दगड़ मा कमप्यूटर कोर्स भी। असली जीवने सुरुवाती लड़ै मा द्वी साल कने गुजरा सोबन तैं पता नि चलि। तीसरा साल मात्र पन्द्रह दिने छुट्टी अयूं त पता चलि बसंती कै हैका ह्वेगी।

सोबनी अर बसंती चर्चा बाद गौं वळुंन बसंती बाबा बच्चू ल्वार पर जोर डाळी कि नोनी हाथ पिंगळा कैर द्ये निथर गौं का होर नोनु बि बिगड़णु खतरा च। अगर कै हैका बिठा नोना पर तैकु रुपो जादू चलि त त्वेतै गौं निकाल मिल जालू। बच्चू ल्वारऽन स्वोचि बिचारी, कि नोनी यू रंगरुप ह्वो ना ह्वो परिवार तैं  संकट मा न डाळी द्यों, यींतैं कैका किल्वाड़ा बांधण मा भले च। बच्चुन अठारह साले बसंती स्कूल छुड़ै अर पार मज्याणी गौं मा बिरादरी का फत्ते ल्वारा नोनु बिजु तैं बिवैन। बसंती पर यति हिकमत नि छै कि वा खुल करि सोंबनु जग्वाल कन वळा बचने बात कैर साकू।

लौंचि च्येली पाळी बंधी गौंड़ी जन गेन्डू खींची हैका घौर बंधीग्ये। बिजू बि सैर मा पराबटि नौकरी कर्दू छै। बसंती का रुप-रंगल बिजु घौर उज्यळु ह्वेगी छै तैन कब्बी नि स्वोचि कि बसंती जन बांद तैकी कज्याण बणली। वा रुप कु इनु रसिया निकळी कि नोकरी छोड़ी घर्या ह्वेगी। अब साल साल भर पोथुलोन घ्वल्याणु भर्येणु बैठिन। परिवार बड़िन पालण पोषणों भार बडिन बिजुन अपणु पुस्तैनी काम अणस्यळु पकड़ी अर कुछ चिरान चुरान करि गिरस्थी गाड़ी खिंचणु बैठिन। बसंती चुपचाप मैंसा खुट्यों मा खुट्टा धरीं गरीबी उकाळ खिंचणी रैन।

      सोबनी पन्द्रह दिने छुटटी अद्दा मा छोड़ी दिल्ली चलग्ये छै, अब तेतैं समाज अर समाजिकते सच्चे पता चलि अर कुछ सैरों मा ठोकर खाणा बाद प्यार कु बुखार बी कमती ह्वेगी छै। तीन चार साल बाद तैकि नौकरी कम्पनी मा कमप्यूटर ओपरेटर का तौर पर पक्की ह्वेन, दिन रात मेनत करि उम्मीद से अग्ने परमोशन अर कमे होण लगिन। जब ब्यौ कनु टेम ह्वे त नजीका गौं वळोन कानि सूणि अपणी नोनी हाथ नि बडैन। “झूट लाण धार पार जु निभी जौं दिन चार”, अर घौर वळोंल धार पार दुसात गौं बटिन ब्यौ मांगी। वा देखण बि नि अयूँ  तैन ब्वली छै कि तुम जनि बी ल्याला मितैं मंजूर च।

आज ब्यौ हुयां चार साल ह्वेग्ये छाँ एक द्वी सालो नोनू छै ब्वारी सरीता भलि स्वाणी निमाणी होनहार मिली। बल, “सुबेरो मुख ध्वयूँ अर बाबो ब्यौं करयूँ फैदामंद होन्दू”। आज अरेन्ज मैरिजे प्रसांगिगता यीं लव मैरेज अर लिव इन रिलेशनशिप का दौर मा बि बिजेता छ। सरिता तैं सोबनु पैल्ये पिरेम कानी पता त चलिन पर तैका बिगरेला पिरेम अर पति धर्मऽल सिकैत कनु मौका नि दिनी। “सुबेरो भूल्यूं ब्यखुन्दा घौर ऐ जान्द त वींतैं भूल्यूं नि ब्वलै जान्द”।

पिछला साल सोबनुल दिल्ली मा फ्लैट खरीदिन अर परिवार वखि सिफ्ट कैरी। गिरस्थी दुन्यां दगड़ खूब दौड़ी अर भागणी छै। समै का पंख भला बुरा सब्बी दिनों तैं दूर सात समोदर पार उड़े ल्यी जान्द जख बटिन वापस औंणे ना सास ना आस।

सोबन सिंह अब बसंती कु बाटू बिसरी क्या निरपट भूलीग्ये छै। आठ साल जनी जु्ग ह्वेगी “निराणी पुराणी बात”। पर आज अचाणचक यीं भेंटन लौंची उमरा डाम दुख्याली छै। यति लम्बा सुमिरण मा वा अपणा द्येळी सीढ़ियां चड़ि खौळ मा पौंछिग्यूं।

अँध्यारु ह्वेगी छै अर तैकु द्येळी भैर ह्यूँ सफेदिन अर भितर ट्यूब लेटा सफेदिन चमकणी छै तति मा सरिता गरम पाणि अर चा गिलास ल्ये समणी खड़ि छै, जब द्वी सालो बिट्टू पापा आ गळे, पापा आ गळे कैरी झट दादी कौळी बटिन फाळ मारी तैकि कौळी मा ऐग्यूं, तब मज्याणी से लेकर घौर तके तन्द्रा टूटिन, अब वींतैं वर्तमान पिरेम पर रौंस अर नि होण्यां पिरेम पर रोस छै लगणु । 

 @ बलबीर राणा अडिग 

* दशोल्या शब्दों अर्थ :-

गवंरा देवी - बर्फ कु पुज्यनीय नौं, अग्वणि - भौत पैली, झड़द्यो - जाड़ो दिन, चुटका - ऊन गरम थुलमा, नालोड़ - बाल गोपाल, बँकापुरी - बिगैर रुक्यां लगातार बर्फ गिरण, साळि - ग्वोठ गौशाला

स्येळ - शीत लहर, अन्वाळ – गडेरिया, लड़क्वाव - बच्चों वाली।


 


Tuesday, 25 August 2020

बांदरों हैंसी

ऐ ले, ऐ गो मालती। चल रे, आज अबेर ह्वेगी घाम द्वफरा ऐगी जति सनक्वाळि जौला वति औला बी त। सावित्रिन बाटा बटिन धै लगै मालती तैं। मालती, औणि छौं गो, जरा ठैर ले। अर मालतिन सट्टा-बटि मा बिमार ससुर जी तैं रुवटि अर दवे पाणि धरि अर समझोण लगिन, जी यखमु धरि तुमारु सब समान, खड़़ु उठा घाम दुफरा ऐग्ये, टेम पर कैर लियाँ अन्वेण, अर दवे खाण ना बिर्सयां। बुढ्यान ढक्याण मुख बे हटे हौं ब्वारी ठिक चा बा ब्वोलि। ऐंरां भगवान त्वे जन ब्वारी नि देन्दू त न जाण ये बुड्या क्या हाल होंदा छाँ, बुड्याऽन मन ही मन बबड़ाट करि। सावित्रिन सोल्टी पीठ पर लगे दथुलि कुर्छला डाळि अर घौर बटि निकळी। जांद-जांद नौनि तै, ऐ चांदनी तौं भाना कुनि मज्ये टेम पर चलि जयां ले इस्कूल अर अपणा भुला तैं समाळि ल्ये जयां, अरे अब भिज्यां उटंगरी ह्वेगी वा बी। अर वा सरपट सावित्री का गेल्या ह्वेगी। द्वी गैल्या इनि सदानी एक हैको सुख दुःख कु सांगु बणि हैंसी ठिठोळी करि रोजमर्रे जीजीविषा कु गदना तर्दा।

मालती अर सावित्री पक्का दगडया, घौर पुंगड़ा बण बूट सब जागा एक दुसरो हाथ बांटि काम कर्दा, द्वियों मा उमरो बी फर्क नि छै एक आध साल अग्ने पिछने। ये वास्ता वा दीदी भुली कु आदर कम अर एक हैको नौ गाड़ि बुलोन्दा छाँ। आठ साल पैलि द्वी ऐकि मैना मा ब्योलि बणि ये गौं मा ऐ छै, अर इनि चांचड़ी बणि खुट्टा से खट्टा मिले गिरस्थी गीत खुसी खुसी गांदा रयां।  

मालती जवैं हुकम सिंह तफुन हरिद्वार मा होटल लौजे नौकरी कर्दू छै अर सावित्री गजे सिंह यनि, छः मैना बद्रीनाथ माळा कंठी बेचदू अर छै मेना घोरपुन पुंगड़ा पातळ, घर्या रवोजगार। दुन्यां हलण चलण अर घिसम घिसै दगड़ घर गिरस्थी लूण तेल से जादा द्वी मनख्यूं आमदानी नि छै। दुसर मा भगवान मिंजाण गरीबों दगड़ एक अन्यों सदानी से कर्दू अयूं, वा गरीब पर जरा अकल कमति देंदू म्येल्यो। भगवान का यीं अन्यों सिकार  हुकम अर गजे बी छाया। कम तेलो भिज्यां चिबड़ाट। कमोंन्दा धमोन्दा जत्गा छाँ हुळयोरपन मा सुदि उड़े देन्दा छाँ, मथि बटिन अजक्याले इन्टरनेशल बिमारी घुट्टी मरण, घौर ह्वो या भैर, कुछ बी ह्वो, ब्यखुन्दा तौन गोळा चींरीं अर मुंडि झमज्याट कैर बिगैर नि रै सकण।

पीणी दा कि फौज त चितान्दा नि पर ये कु गिरस्थी पर बड़ू असर पड़दू साब। एक दिन का द्वी पेग, र्मच्छवाड़ी पाणि किले न ह्वों नमकीन समकीन लगै एक दिन कु कम से कम सौ डेड सौ त कखि नि गयां। अर! कै दिन देशी लालमणि या फौजी मिलग्ये त भै साब एक आदिम तीन सौ से मुड़ि नि बैठदू। अब तुम ब्वाला साब कख बटिन होण मवसिन। अरे मास्तो एक दिन मा ते द्वी तीन सौ क्या चीज नि ऐ सकद, खाण पीण से लेकर पैरण ओड़ण। पर क्या कन, बल जख स्वोनु च वख नाक नि अर जख नाक च वख स्वोनु नि। सैद जै दिन अकल बटेंणी छै यु पीणी दा कि फौज कखि बोग लगि म्येल्यो। भलि अकल अंटि वळा घौर मु रै सोकार बणि जान्द। बूंद बूंदऽल बल घौड़ू भरिं जांद।

अस्सी परसेंट लोगों कु यु ही हाल च आज पाड़ मा बिगैर ते दारू क्वी को-कारिज नि होन्दू क्वे द्यबता नि तूसदू। अरे होर त होर बाज-बाज जागा देखण मा आई कि मरोड़ा मा बी दारू चैंद बल। त बोला कख रै मनखी अर कख मनख्यात। पर क्या ? रिवाज चलिं त चलिं, रिवाज त्वड़ण गौं हंत्या माणद। हुकमु अर गजे त यूं कामों मा नम्बर एक पर रैन्दा। कब्बी कब्बी त यनु समै ऐ जान्द कि आज एक, भ्वोल दुसरू अर परस्यूं तीसरा घौर क्वे न क्वे कारिज हुर्ये जान्द त पीणी दीदों की बार ही बार। पाल्ट्यूं का चक्कर मा कैकि ज्वानि कैकि मवासी धार लगि जान्द। अब यूं मास्तों तै क्व बतौं अकल। वु त कत्गा हुकम अर गजे का जन भग्यान होन्दा जु मालती अर सावित्री जन लकारवान गुणवान ब्वारी पौंन्दा, निथर बाज-बाजों मवासी ढूंगा मा छिन साब।   

मालती अर सावि़त्रीऽ जिन्दगी अपणा मा रेस ना बल्कि मैराथन जन गिरस्थी बाटा तैं सुबेर हुरमुर्र से राति दस बजि तक नपदा। जिन्दगी से न ज्यादा उम्मीद उत्साह ना ही निरासा। किलेकि माटा अदिम माटा मा खुश छाँ देश दुन्यां मा क्या होणु वे कु फर्क तौं जीवन मा ज्यादा नि पड़दू छै। सम्पूर्ण गिरस्थी छै पुंगड़ी पातळ, गाजी बाखरा सब। अपणा हटगा पिसी क्वोदु कापुलौ दगड़ चैड़ बेचैड़ बैठा दिनों मा मनरेगा मा ढैला पैंसा कमोन्दा, मनरेगा अर भैंस कु घ्यू दूध ही वूं कु आय कु साधन छै वीं परताप नालोडों इस्कूलो छुवटु म्वटु खर्चा अर अपणी मांग बिन्दी की जर्वत पूरी ह्वे जान्दी छै। कब्बी कबार त वा डंट मर्द बी फस्के-फुस्के अपण गोळा चिरोण तैं डन्ट्ये देन्दा। पाड़ै नारी पाड़ जन दिल। पतिवर्ता की सीमा से बी अग्ने कर्मो की पवि़त्रा। आखिर रामी बोराणी कु डी एन ए का जु छ साब।

कुल मिले कि बोलि जावो त सन्तोष कु जीवन चलणु छै द्वी दगड़यूं कु। हाँ जीवन मा नि छै त अजक्याला हाईटेक जमानु कु हलण चलण, साज सृंगार, क्रीम पोडर, सैंपु साबुण, हुर्का फुर्का पैरवार। लोगों देखि मन कन नि रमसान्दू छ, पर ! बिगैर सक्या अफुं थैं खये जांद। संतोष तैं पराभव मानी खुस रोण बी जीवन कु एक बड़ू परारभ्ध होन्द। बल खुसी से बड़ि क्वे खुराक नि होन्दी । यु परम सन्तोष कु प्रभो छै कि द्वी गैल्यूँ मुखड़ी अच्छा अच्छा ब्यूटी पालर वळों से बी जादा दमकदी। आहा ! परिकति बेटियूं परिकति जन नेचुरल रूप सज्जा। अब द्वी लौंचि ज्वानि उलार छोड़ि बाल बच्चादार जिमेदार गुस्याण बणिग्यां छै। गौं पंच्येति मा बी अपणा जड़ जंगल अर गौं कि भले का वास्ता सच्चा चिंतक अर कार्यकर्ता छाँ, गौं का हर सुख दुःख का साजीदार। होण बी किले नि या ही मनखी धर्म च, समाज मा रे समाजिकता जरूरी ना बल्कि जर्वत होन्दी। बणमैंसा जन अपणु पुटुग त जानवर बी भर्दा।  

समै कु चक्र कब कने घूमि जावो येकु जबाब आधुनिक विज्ञान बी देण मा असर्मथ छ अब ये साला सुरूवात मा चीन बटिन या कुरोना बिमारी क्या आई दुन्यां कु वैभौ तैं जन ग्रहण लगि।  संगसार तैं तातु दूध ह्वेगी न घुटयेणु च अर न थुक्येणु। नौकरी चाकरी, बात व्योपार सब ठप ह्वेगि ये कु असर छव्टा मजदूर वर्ग पर ज्यादा पड़िन, सरकारी नौकरी चाकरी वळा विचारों त मौळयारों पाणि जन तुप-तुप बगणु छ पर नि रोण ह्वेन पराबटि वळुं । उन त हुकमु अर गजे साल मा अद्दा साल सिजन पर भैर बटिन अदेलु बुस्येळु कमै कर्दा, लूण तेल का अलों अपणु बीडी तमाखु निकल्दा छाँ पर ये साल निरपट घर्या ह्वेग्यां छाँ।

करोनाकाला असर से मालती अर सावित्री घौर बी अछूतो नि रै। हुकमु अर गजे कर्मकार जनान्यूं का चल्दा पैली बटिन घौरा काम मा जर्रा असंगळया त छाँ पर अब ये लौकडोन मा पूरा लौकडौन ह्वेग्यां। पैली जर्रा नोकरी धौंस मा रैन्दा पर ये साल त घौर मु चम्पत र्निखालिस। हाँ वा द्वी सीं हौल गार्द ना जयाँ बाकि उनि जनान्यूं मा का चैंर्या।  लौकडौन का दिनों मा त प्येणु तैं मन मस्वे रयाँ पर जनि लौकडौन खुलिन तौं कि गोळि टपट्याट होण लगिन अर गौं का हौर लुंडों दगड़ वा बी बजार बटिन डैली टली होण लगिन। उन सरकार बी इत्गा उद्धार निकली कि वेन सबसे पैली दारू दुकानी ख्वोलि। कैकि मवसी जावो त जावो सरकारन त अपणी आमदानी देखण। यु अकल त प्येण वळुं तैं होण चैन्द, पर मिन ब्वली नि कि इना अकल का मामला मा पीणी दीदों अकल ढकणी पर रैन्द।  

अब रोज द्वी घौर मु कै ना कै बात पर हल्ला कज्ये होण लगि। जै खुणि घरेलु हिसां ब्वल्दा  वा माभारत मालती अर सावित्री घैर मु होण लगि। घौरा कूणा कुलाणा कुट्यारी धरिं ऊँज पैंछा पैंसा ते दारू भ्योट चढ़ण लगिन। दिल्ली बम्बे अर हौर सेरों बटिन वापस घौर अयां कत्गा लकारवान मर्द माणिकन अपणु खेति बाड़ी काम सुरू कर्याली छै पर ऐरां यू दुश्मनों तैं कु समझावो सुदि मर्द वळि तड़ी मा तड़तड़कार रैन्दा। अब सरकारो क्या दोष खाण कमोण त हमुल च। भर्यां पुटुग तैं क्या पता भूखे कणाट अर बांजा क्वोखऽल क्या चितै स्वेली पीड़ा, सरकार भौंरि बी अर बांजी बी।

आज मालती अर सावित्री द्वी सौंजड़या अपणी स्वल्टी दथुली भुंयाँ धैर पार चैंधारा बिसौंण्यां मा बैठि यीं बात पर छुँवी बात पर मिस्यां छाँ कि यीं मुसीबतौ हल क्या ह्वलू। वूं ज्वानी खून से घौर मु खाण लाणे क्वे अर्चन नि छै पर मर्द लोंगूं यनु घौर बैठण अर मथि बटिन डेलि टुन ह्वे कलौं धन्दा से परेशान छाँ। मालतिन ब्वली यार सावि ज्यू कनु छट छोड़ि ध्यूं ये गिरस्थी अर फाळ मारि ध्यूं अफार भ्यलपाखा भ्योळ, पर ऐंरा क्या कन वा द्वी पोथुला ह्वेगी अर दुसर मा दय्बता जनु सोरा जी निथर ये मनखि से मुक्ति भलि छ। अरे भुली भगवालन बी कनि उल्टी कलम से लिखी यु किसमत।

सावित्रिन बोली अरे दीदी तु ठिक त ब्वनी पर फाळ मारि हमारू दुश्मन, अरे हिकमत कन पड़ली ले। आखिर मनखी त छाँ कन-कन दंत्याळ सिंग्याळ हमुन बस मा करि वा क्या चीज छ, अरे मि त आज तक जग्वाल कनु छै कि सुधर जैलो, पर ब्याली राति त मिन द्वी झपाक धरिं दिनी। अर सावि खितखित हैंसण बैठिन, गुमसुम महौल जर्रा हंस्वाड़ ह्वेगी छै। सावित्री अग्ने बोली ऐंरां बिचारा तैं झांज मा न जाण कख लगि ह्वली आज सुबेर कमसाणु छै। अर हाँ आज त सुबेर मेरा साळी बटिन औण से पैली कल्यो रव्टि बणण लगी छै ले, मि बी चुप रयूं मिन द्वी रव्टी घूळि नोणि मा अर निकळ ग्यूं। मालतिन बोलि यार गौ म्यार बसे बात त नि यनु हाथ उठोंण आखिर जन बी ह्वो हमारू आदिम छ, यार मिन सूणि प्यार पिरेम से बल ढुंगू बी काबू ऐ जान्द सच्ची ? सावित्रिन बोलि चला यीं बाटा बी देखला।

तबारी पता नि द्वी बान्दर कख बटिन ऐन अर वूँका सामणि एक हैका तैं देखि दाँत कताड़ी ठट्टा लगाण बैठिन, सावित्रिन बांदरों तैं बोलि हैंसा ना रे बजरंगबल्यो जति हैंसणा वति आश्रीवाद ध्या दौं। मर्दो हम बी तीलु रौतेली अर रामी बोराणी का बंसज छाँ हार मानण हमारा खून मा नि छ हम बी दिखोला दुन्यां तैं हमारा ब्वै बाबन अनपढ़ नि रख्यां हम। दा रे मालती ! अब त यूं गुणि बांदर बी हैंसण लग्यां हमु पर, चल रे उठऽ देर ह्वेगी अज्यूं घास बी काटण, मेरी वा भैंसी एक अड़काट लगान्दी अगर मि टेम पर घौर नि पौंछी त। सावित्रिन एक सांस मा ब्वोली। अर द्वी दगड़योंन दथुलि अर सोल्टी उठे अर बोण चलग्ये घास तैं। चल्दा चल्दा बात विचार करि आखिर वा एक नतिजा पर पौंछिन।

    ब्यखुन दां द्वी मर्दों खाणु मालती घौर रखिन आज इतवार होण से बजार लौकडौन छै द्वीयूँ पियूँ बी नि छै, द्वी जनान्यूंऽन हुकमु अर गजे तैं अपणी योजना बतै अर ढंग से समझेन कि र्सरू काम हम कर्ला तुमुल केवल दगड़ पुर्योण। एक हप्ता बाद मुड़ि रोड़ मा प्रधान जी दुकानी बगल मा खालि द्वी कमरों मा एक भुजि दुकान अर एक चा मिठें दुकानों उदघाटन ह्वेन। हुकम की भुजि दुकान अर गजे चाय मिठें। गजे तैं हरिद्वार होटले नोकरी फैदा त हुकमु तैं फेरी मा चिफळी गिची लगाणों मौका दिये ग्यो। द्वी घौरे बसग्याले साग भुजि दगड़ गौं का होर घौरें भुजि बी हुकमु का दुकान मा बिकण लगिन अर कोरोना का डौर से बजारे मिठें बदली गजे की दुकानी मिठें लोग खूब पसन्द कन बैठग्यां। द्वी समझदार सौंजडयों प्यार पिरेम, मेसी अर अपणा मालिकों दगड़ बरोबर भगीदारी से इनु सकारात्मक परिणाम निकळी कि द्वी दुकानी दिन व दिन परगति कन लगि। अब हुकमु अर गजे तैं पैंसों चस्का लगण बैठगिन वूंन पीणु बी भौत कम कैर्याली द्वी झांजी लोफर अब प्रगतिशील बिजनिसमेन का बाटा मा हिटण बैठग्यां छै।

आज द्वी मैना बाद फिर मालती अर सावित्री द्वी गैल्या वीं चैंधारा बिसौंण्यां मा बोण बटिन घासे सोल्टी बिसै दुकानी नफा नुकसाने छुँवी पर मग्न छाँ तबारी वा द्वी बांदर न जाण कख बटिन ऐन अर वूँका भर्यां सोल्टयूँ मा बैठण लगिन जनि सोल्टयाँ उन्द फर्केन्दी वूंन बांदर हकेन। बांदर फट भाजी अर पार ढुँगा मा बैठि तौं तैं टुकुर टुकुर यनु देखण लगिन जन ब्वना ह्वला कि अब ना ह्वा सौंजड़यों उदास अब त हैंसा। मालतिन हथ जोड़ि बोलि जै हो हनुमान जी तुमारी हैंसी आश्रीवाद सुफल होणु लगिन अपणु यनु आश्रीवाद बणे रख्याँ परभो। अर द्वी गैल्या हथ जोड़ी खित खित हैंसण लगिन।    

 

@ बलबीर राणा ‘अडिग’