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Wednesday, 23 May 2018

गढ़वळि दोहे



कबि खुशी कबि गम, जिंदगी अपणु ढंग।
कबि खुदेड़ उदास उबासी, कबि रंग-चंग।।

खुश रावा या उदास, सांस तलक संसार।
घोरे बात घोर तक, भैर बण जैलू बजार।।

ढोले डवोर कसी रैली, बजी बी जाला ढम ढम।
जीवन चाकरी चक्र च, कबि भिज्यां कबि कम।।

जरा सौजी सौजी, भट नि भड़कण दूसरे आग।
जमानु पिरुला बण बस्यों, चट लगलि बणांग।।

जरा मुंड झुकणे जर्वत, फेर तेरु मान मेरु मान।
तड़तड़ी तड़ी स्येखि कु, न क्वे मान न सम्मान।।

मानण पर दयबता, न मानण फर ढुंगू ही नाम।
अपणा जमीरे बात च, किले लग्यां खाम-खाम।।

जीवन पाणी  जनु, बाटू ख्वज्ये जांद अपणा आप।
ज्यादा स्वचणे बात नि, धर्यों नि चैंद हाथ मा हाथ।।

क्या तुमन बींगी क्या मैन, सब अपणा-अपणा अनुभो बात।
उज्याळो देखणु आँखा चैंद अडिग, बिन आँख्यों राती-रात।।

24 मार्च 2018
@ बलबीर राणा "अडिग"

Tuesday, 17 April 2018

माँ तें बुरु नि लगद


जब तू मसौड़ी-मसौड़ी प्येन्दी
 पुटुग भर्यां बाद
मुल हैंसी लात मारी देन्दू छै
माँ छाती पर
अर होर त होर !
बेशर्मी देखा?
एक लंबी मूते तराक बी
छोड़ी देन्द माँ का मुख फर
 पर! माँ तें बुरु नि लगद
बल्कि होर आनंदित ह्वे
भुकी प्येन्द छै
तब क्या?
आज क्या?
वेंकि ममता मा क्वी फरक नि ऐ
चै तू अपीड़ ह्वे
मुख मोड़ी दूर किले नि चल्गे ।

@बलबीर राणा "अडिग"

Saturday, 7 April 2018

जातिगत आरक्षण


बंद करो अब बंद करो, जातिगत आरक्षण बंद करो
आरक्षण की जंजीर में, प्रतिभा बांधना बन्द करो
जकड़ रही है कर्म शक्ति, आरक्षण की बेड़ियों में
देश की एक युवा शक्ति, भ्रमित हो रही फेरियों में
जहर न घोलो संकीर्णता का, बुद्धि न इनकी मंद करो
अपने वोट बैंक के लिए अब, हथियार बनाना बंद करो

आरक्षण से शीर्ष चढ़े जो, वे भी कतारों में बैठे हैं
पचास प्रतिशत वाले पुत्र को, कुर्सी के लिए ऐंठे हैं
हांसिये पर हैं वे अब भी, जिन्हें आरक्षण की दरकरार है
जाति विशेष की खाई ने, डाल रही देश पर दरार है
श्रमशक्ति दो हाथों में, फ्री लॉलीपॉप देना बंद करो
प्रतिभा उपेक्षित करने का ये, गंदा धन्धा बन्द करो।

ये कौन सी हक लड़ाई है, निर्दोषों का घर जलाने का
किसने हक दिया तुमको, निरीहों पर डंडा चलाने का
अरे बंधुओ दम है आप पर, भीम राव बनके दिखाओ
संविंधान के अध्य्याय में, एक पन्ना जोड़के दिखाओ
अरे मौसमी झिंगुर झुंडों, राष्ट्र शांति न अब भंग करो
आरक्षण की आंधी से, घरों को उजाड़ना बन्द करो।

इस वायरस से रुग्ण हो रही, भारत की कर्मप्रधान जातियाँ
कर्मशक्ति भिखारी बनी पटरी पर, बंजर पड़ी है माटियां
ठाकुर ब्राह्मण पंजाबी मराठा, कब कोई लाईन पर लग जाये
चिंगारी है यह गृह युद्ध की, कब ज्वाला बन भष्म कर जाये
सुन लो 'अडिग' आह्वान मित्रो, राष्ट्र को न अब शर्मिंद करो
आरक्षण के तीर से, प्रतिभाओं को घायल करना बंद करो ।

रचना:बलबीर राणा 'अडिग'

Friday, 30 March 2018

गजल "जलम भुमि"



जन्म लिनी जे थोल, जख बाळापन बितेन
जे माटा पल्यां पोस्यां छकी घुड़मुंडी खैंन।

रुंड-मुंड देह बणाण वळी हव-पाणी त्वे सेवा
डाला-बोटी, गाड़-गदनों फाळ मारण सिखैन।

स्वाणी प्रकृति को भरिं कुठार ज्ञान को भंडार
तेरी जोतsन यूं आंख्यों तेँ दुन्यें माया दिखेंन।

पैली किल्क्वरी फर जे अवाज मा दुलार सुणि
जे बोली भाषा मा अपणोंक भिज्यां लाड़ पैन।

धन-धन त्वे जलम भूमि, धन-धन हमारू जोग
तेरु दूधो कर्ज आजतालक क्वी उतैर नि सकेन।

ब्वे की कोळी छै वा वसुधा, बुबा को आशीष छ
याद रख्यां ते जलम भुमि से कबि मुख न लुकेन।

जख रैला भुलो जरूर भिटवली कर्या बिसर्या ना
खुद लगीं रेन्द ते धर्ती, वा तुमारी जग्वाल मा रेन्द।

रचना: बलबीर राणा "अडिग"

Sunday, 11 March 2018

चिठ्ठी



घोर बटिन औंदी छै जब वा चिट्ठी
कुछ होंदी छै खट्टी कुछ होंदी मिठ्ठी
रुवांसी आंखरों मा दिखेंदु ब्वै कु दुलार
बाबा भ्यजदू छै सब्यूँ की ख़बरसार।

आंदी छै भुली की फर्मेश,भैजी की सल्ला
परदेश मा ना करि भुला कै दगड़ हो हल्ला
होन्दू छै काकी-बोड़ीयों कु मयालु आसिरवाद
नखर्याळी बोजियों की माया-मसखरी बात।

यार-आबतों की कुशल मिल्दि, गों ख़्वालों कु रंत-रैबार
बांचि जांदी छै वा चिठ्ठी, सब्यूँ का समणि बार-बार
लैंदी भैंसी की छविं लगांदी, लतेड़ गौड़ी की बात
खूब हंसान्दी छै ये परदेश मा, वे उज्याड़ा बल्दे कर्मात।

रिंगाले कलम से लिख्यां वों आंखरों मा
भटकणु रैन्दू मन फिर तों डोखरों मा
मैनो तक रैन्दी छै माटी की सौंणी सुगंध
कागज मा बन्ध्यों रैन्दू ज्यू कु अटूट बंधन।

जति मयाळी छै वा चिठ्ठी, तति गुस्यार बी होंदी छै
रोस-खरोस माया-ममता, एकी अन्तर्देशी मा ऐ जांदी छै
जति शर्मयाळी होंदी छै चिठ्ठी, लाजवंती बी उत्गा ही छै
मान मर्यादा मा रैन्दी छै वा, कबि बेशर्म बी ह्वे जांदी छै।

लुकि-लुकि पढ़ी जांदी वा कबि, कबि पंच्याति मा ऐ जांदी छै
कबि सिराणा पर  चुप स्ये जांदी, कबि छाती पे बिणान्दी छै
कबि खुद का आँशुन भीजी जांदी, कबि खुशिक भुक्की प्ये जांदी छै
कख हरची ह्वली तू प्यारी चिठ्ठी, दयेख अब वा फोन नि उठान्दी छै।

कन याद करदी छै सब्यूँ की तु चिठ्ठी, अब कन यादों मा रैग्ये तु
सब्बि का ज्यू तेँ समलोणी वाळी तू, कन समलोंण्या रैग्ये तु।

@ बलबीर राणा "अडिग"

ऐरां बल हल्या


ऐरां शब्द सूणी
झिकुड़ी मा डाम लगि जांद
हल्या त ठिक च
मि होल लगान्दू
पर ! ऐरां कु क्या मतलब?
ब्वे न बोली
त्यारा बसो कुछ नि
निकाजु मणखी?
द्वी बल्दों पुच्छयडू मडकान्दू
तैकु ही ऐरां च,
मैं सोच मा पड़ीs
कि भाई हल्या ही
धरतिल फाड़ि
अन्नsल ही उगांद
अर मणखी क्या जी जबानों
पुटुग भरिन
वा कम्प्यूटर, मशीन
मोटर-गाड़ी, बंदूक
ग्वाला-बरूद कैका
चुलाणा नि पकणा देखी अज्यों तक
अर गू भी अन्न को ही देखी
लोहा-लकड कैन भी नि हगी
ज्यान जीवोंण वालू
निकजु किले
समझ से परे।
@बलबीर राणा "अडिग'


Tuesday, 30 January 2018

सचि माया



धरती अर अगास
द्वी मायादार
टक लगे दयखणा रेन्द
एक हेका तें दिन-रात
मायालु ह्वे
कबि भिटोळी नि ह्वे द्वियों की
अर न होणे आशा
पर !
समग्र पिरेम छां यू मा
वा नीलू असमान
कबि रण-रणा घामल
कबि रिमझिम बर्खल
धरतिक कोळी भरद
अर हरि धरती नाना परकार का
फल-फूलोंsक सुगंध भेजिद
धरती अर अगास
क्वसों दूर ह्वे किन बी
समर्पित छां युगों बटिन एक दुसर पर
अर समझान्दा रेन्द दुन्यां तें पिरेम
कि !! पिरेम मा विश्वास, समर्पण छ त
दूरी क्वी अड़चन नि होंद
सच्ची माया स्वार्थ नि त्याग मंगद।

@ बलबीर राणा "अडिग"