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Tuesday, 18 April 2017

कश्मीर से सैनिक की हूक


हाथ खोलो सिपाहियों के या तैनाती को बंद करो
गद्दारों की बेशर्मी पर यूँ न इस वर्दी को शर्मिन्द करो

छाती ठोकना बन्द करो अब कश्मीर के हालातों पर
पत्थर नहीं ये चपत लग रही लोकतंत्र के गालों पर

कठपुतली बन गये हम तुम शकुनियों की चालों से
हीन हो रही कर्तव्यपर्याणता जयचंदों की बोलों से

सीमा पार की चिंता छोड़ो उनसे हम निपट लेंगे
नापाक कदम जो बढ़ेगा इधर वहीं उसे तोड़ देंगे

तुम निपटते रहो अपने तिकड़ी धूत के पांसों से
लेकिन हमें न लज्जित करवाओ रोने वाले सियारों से

रोज तिरंगा जल रहा है अभिशाप बनी इस धरती पर
मुठ्ठी भिंची ही भिंची रह जाती गद्दोरों की करतूतों पर

अब दूध पिलाना बंध करों इन आस्तीन के सांपों को
370 की कटोरी से पी कर ये ढंस रहे हैं अपनो को

असहाय पड़ी बंदूक, अपनी बेचारी पर लज्जित है
जिस बंदूक की आग पर तुम्हारी कुर्सी सज्जित है

कहाँ जाते मानवाधिकार वालो जब पत्थर हम बरसते हैं
दुम दबाकर कहाँ बैठ जाते जो मंच चौपालों से गरजते हैं

किसी के सत्ता के मोह ने ये आजीवन का यह रोग दिया
किसी के कुर्सी के चक्करों  ने अधूरा हमको छोड़ दिया

सीना तान के रहने वाले, पीठ पीछे वार से हैरान हैं
स्वच्छ बर्दी पे दाग लगाने वालों से परेशान हैं।

रचनाकार :- बलबीर राणा 'अडिग' उत्तराखंडी
© सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, 16 April 2017

****मातृ भाषा अर नयीं पीड़ी****

1. मातृ भाषा

जै भाषाक माहौल मा
आँखा ख़्वली
जै भाषा मा ब्वैsन
लाड़ प्यार करि
ब्वन सिखण से पैली
जै भाषा तें
अवोध मन बिंगी जांद
जू भाषा ब्वै की दुधे धार दगड़
शरीर मा पोंछद
वे खुणि बोल्दा मातृ भाषा
अर मातृ भाषा
जीवन पर्यंत म्वरदी नी ।

2. नयीं पीड़ी

मेरु क्या दोष च
ब्वैन हिन्दी मा लाड़ करि
बुबान अंग्रेजी मा प्यार
स्कूलम हिंगलिश सीखी
त मेरी मातृ भाषा
क्या ह्वे।

@ बलबीर राणा "अडिग"
www.ranabalbir.blogspot.in
उदंकार से

Monday, 19 December 2016

***बगत****


पल्या धार बटिन हवा आणी त छै छयी
माया की खुशबू अपणा दगड़ लाणी त छै छयी।
बंद रख्यां छां जब ड्वार मोर तेरा
ते हवा न हैंका तरफ जाण त छै छयी।
सिं चाँद सी मुखड़ी नि देख सकी तू
मुंड कु पल्ला वेन सरकाई त छै छयी।
खुटा तेरा ते बाटा नि लग्या वें कु क्या कसूर
छै फुट्या सड़क तेsका गों जाणि त छैं छयी।
धै नि लगायी सुणदरा भौत छां कंदूड् लगे बैठ्यां
आंख्यों आंख्यों मा वेन विंगायी त छै छयी।
तू मुंड पकड़ी रुणु छै पीठ फरके ते बाटा मा
जांदा दों तेन टाटा करि हाथ हिलायी त छै छयी।
@ बलबीर राणा 'अडिग'

Sunday, 10 July 2016

भाजण द्या


भाजणा छिन भाजण द्या रुकाणु सवाल बिल्कुल नि,
जर्वत ह्वली हैक आळा मन्खियों अकाळ बिल्कुल नि।

पंख त पैली वों पर लगिन जु पलायनक रुण रुणा छिन,
देखा-देखी सब्युं का उड़ी अब कैकु सवाल बिल्कुल नि।

लगीं छिन आग जब चौं तरफ़ा सब्युं का फुक्येलु मेरु क्या,
पाणि ल्येणु सांसु नि छिन त जग्णु मलाल भी बिल्कुल नि।

बल सुख सुविधओं की बात नि होंदी त पाड़ वाळी बाते नि,
गाड़ी मा चलणे आदत जु पड़िन उकाळे बात बिल्कुल नि।

@ बलबीर राणा 'अडिग'
© सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, 29 June 2016

ज्यूणु सारू


जब आँखि सुदि-सुदि
टबराण लग जांद
गोळी गलघटि अर
कोंकालि ह्वे जांद
अथा मंखियोंक बीच
एकुलांस चितेन्द
रौंतेला डाना-कांठा
फुलोंक बगवान मा भी
मन नि रिझेंन्द
रंगीला पिंग्ला
पोथुलोंक बीच
ज्यू घुघुती बणि रैंद
अर
नजर एकsss टक
कखि दूर
कुछ खुज्यान्द
ये खुणि लोग
ख़ुदक लक्षण बोना
खुद हो या माया
जु भी च
बिमारी भलि नि
फर
ज्यूणु सारू भल च।

@ बलबीर राणा 'अडिग'

Monday, 27 June 2016

आखिर दों

मन्खियात का सारा ज्यूण जिंदगी
निथर काटम्-काट मा कटे जाली जिंदगी
कुदरत की दियीँ सामोण ठुकरोण नि च
आखिर दों लखड़ों दगड़ छार त बणली जिंदगी।

@ बलबीर राणा 'अडिग'

Tuesday, 24 November 2015

अब चिंतन नी

चिंता अर चिंतन
कबेर तलक रेलू खाळी मंथन
अब मंथन कु बगत नि
चट करा कुछ जतन।

सुख छै: त रगर्याट किले
बिन तीसक् टपट्याट किले
जै पाड़े असन-आतुरिल
उन्द भाज्यां तुम
शैरों बटिन ते फर
चिंता अर चिंतन किले।

हिम्मत छ त आवा दों
बारामासी जुद्ध जुटयूं
तुम भी बोलां बिटवा दों
दुःख बिपदा को आतंक मच्युं
सुख की बंदूक चलावा दों।

द्वी दिनी मेहमान किले
पिकनिक तक ही पहाड़े सैर किले
अगर पलायन समझदां छां तुम त
घर की कुड़ी फर जाळा किले।

@ बलबीर राणा 'अडिग'
बैरासकुण्ड चमोली