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Sunday, 25 August 2019

चरितर



लोगुन बोली
बधै हो
बल तुम नेता बणिग
मिन बोली कनै भै ?
अरे !
यति हिम्मतदार
क्व ह्वे सकद
जु न उत्तल
न अवतल
बिल्कुल
समतल लेंसा
अग्वडि झूट
ब्वलि सकों।

@ बलबीर राणा 'अड़िग'

Thursday, 22 August 2019

बस्योरा दिनों की बात


          


समै की बात न हो अर बगत कु फेर ना फ़र्क्यो त धर्ती फर जीवन चक्र हमेशा एक जना ह्वे जांदो,  परिवर्तन तैं प्रकृति को नियम माणे जांद यो ही समयचक्र छ। बल चौड़ी चुसण्यां याने समया हिसाब से जर्वत अर जर्वत का हिसाब से चलण ही सार्थक माने जांद। वर्तमानल हमेशा गाळी खै अर अतीत हमेशा पूजनीय रयो इनु मेरु अपणु विचार च, बल भै या काम ठिक नि होणु स्या काम खराब होणु, अजक्याल पता नि क्या होणु! यो जमाना क्या कनु। हमारा टेम फर इनु नि होन्दू छै उन होन्दू छै, उगैरा उगैरा। इनि बात अक्सर आम जुबान से सुणण मा आंद विशेषकर दाना सयाणौ गिचा सि।

      चला जादा छुवीं ना मिसै कि मि बि अपणा समै इस्कुल्या परम्परौ इनु किस्सा नयां छंवाली तक पेंछाणों परयास  कनौ छौं, ज्वा काम आज हम चाणा बाद बि नि कैर सकद। ये मा कैकु क्वी दोष नि बल्कि मितैं बदलो परभो दिख्येणु। वर्तमान शिक्षा का ये व्यवसायिकण कालखंड मा शिक्षै पूरी अन्न्वारै बदलिग्ये पैलि आर्थिक रूप से गरीबी त जरूर छैं छा पर लोग ज्यू मन का धनी छा अर ये धन मा सबसे बड़ो धन छायो अपणुपन, जु आज क्वसों दूर दिख्येणों। यो अपणापनै एक मिशाल छै इस्कूला मास्टरजि अर गौं वलूँ कि। जख गुरुजि सिद्धहस्तता से नौनों तैं पढान्दा छा अर लोग गुरुजी कि तन-मन-धन से सेवा भक्ति करदा छा।  सेवाकर्मैं यी श्रणि मा एक काम छायो नौंन्याळों स्कोल मा बस्योरा जाण। हमारा स्कूल मा ये पर्था सन छ्यासी मेरा पांचवीं पास होंणा बाद द्वी तीन साल तक रैयी ह्वली ज्वा तख देशी मास्टरणी जीका औणा बाद हर्चिग्ये छै। दगड मा गुरुकुल पर्था को आखरी अंश निबटि गै छौ।

      सटीक त याद नि पर सन चौरासी से पैलि कक्षा आठ अर अठ्ठासी तक पाँचें बोर्ड परीक्षा होंदि छै। हमारा यख तै टैम पर बोर्ड परीक्षा वाळौं तैं गुरुजि राति इस्कूल मा पढ़णा वास्ता बसैरु बुलौंदा छा। देर रात तलक गुरुजि हम नौन्याळौं पढ़ै लिखै समाज संस्कृति अर संस्कारवान बण्णें शिक्षा बि देंदा छा। जख स्यणकरा नौनौं तैं यो बसैरु सजा सि कम नि छौ वखि हुणत्यळौं तैं राम बुटी छै। बस्योरा (बसेरा) वा एक साल मेरी जिंदगी कु इनु समै छै जैकु ऋण देण नामुमकिन छ।

      जख अजक्याल ट्यूशन या एक्स्ट्रा क्लास मा घंटाभर पूरो होण पर मास्टर सवाल तैं अद्दा छोड़ी बच्चों कि छुट्टी कैर दुसरा दिन पर छोड़ी देन्दन वखि हमारा गुरुजि एक सवाल पर राति बारा बजै देंदा छा। उन त आज बि कतगै  गुरुजि इनि निस्वार्थ विद्या सेवा मा लग्यां छन। इना सरस्वत्या सेवकों तैं खुट्टा बानी सेवा लगोन्दो।  अपणा ये संस्मरण का माध्यम सि मि अपणा गुरुजी स्वर्गीय श्री विश्वेस्वर दत्त गौड़ जी अर श्री केसर सिंह बोरा जी तैं सेवा लगोन्दो जौंका अतुल्य परतापन आज मितैं दुन्यां दयखण लैख बणै।

      मेरु बसेरौ काल उन्नीस सौ छयासी छौ। कत्गा याद तै समये छन जौं तें याद करि आज बि मन वे ग्यारह सालो बालक बण जांद। हम सब पाँचा विद्यार्थियों को बिस्तरा भादो मैना बाद इस्कूल मा ऐ जांदो छौ। बिस्तर बि अजक्यला जन म्वटि रजै गद्दा ना बल्कि एक दौंखि या दरी, एक चादर, एक-आद कमोटू/कंबल।  वे टैम पर बिजलि नि छै सब्यों अपणी डिबरि लैंयीं रौंदी छै, जौं घौर मा मट्टी तेलै समस्या रैंदि छै सु हैका दगड़ एडजस्ट ह्वे जांदो छै। जाड़ोंक दिनों मा कमरा ळिातर आग जगोंदा छा। लखड़ों क्वे कमि नि होंदी छै। छ्वटि क्लास वळा एक-एक लखड़ो अर पांच वाळा साम-सुबेर द्वी द्वी लखडा दगड़ लांदा छा। जौंका घौर मा लैण रैन्दु छौ वा गिरेवाटरै शीशी पर दूध लौंदो छै। भुज्जी, घर्या दाल, चौंळ अर घ्यू लोग श्रद्धा से गुरुजि तैं देंदा छा।    

      नौनि लकार वळी होंदी, वो व्यखुंनिदा गुरुजि खाणौं बणाण मा मदद कर्दा अर हम नौनौं ड्यूटि भांडा मज्यांण पर  लगी रैन्दी छै। जनि गुरुजिन बोली जावा रे लड़को, उन्नी हमारि रेस उसैन बोल्ट से बि तेज होंदी छै भडडु दाळ वास्ता, किलेकि जौ पैलि पौंछदू छौ वैको हक़ होंदो छौ भडडु फर। गुरु रसोई का भडडु दालौ जन स्वाद आज पांच सितारा होटल मा तक  नि चितायी। राति पढ़ै का बगत जैतैं निन्द औंदि वैकि सजा छै भैर इस्कूला कोणा पर खड़ो होंण जख बटिन गदेरे स्यूंस्याट अर मिडखों टटराट सुणेन्दू छौ, वे गदेरो मसाणों तमाम किस्सा सब्यों तैं पता छै फेर कैकि क्या मजाल जो खड़ा होणा डैरन स्ये जावो। इनि एक दिन एक ढांट नौनु भैर बटिन गुम ह्वेगि छै। द्वी गुरुजि राति ढूंडद ढूंड्द परेशान ह्वेग्या छा। सुकर ह्वो बाद मा वको बुबा वे तैं घौर बटि वापस ल्येन तब गुरुजि मुखड़ी पर संतोष आयि। सु ढांट इले कि वा भै पाँच क्लास मा सोलह सालों ज्वान छौ अर ज़रा सीधो लाटो  छौ हम सब वे तैं ढांट ब्वल्दा छा।

      हमारा गौड़ गुरुजी उम्रदराज अर नजीक गौंका रौण वळा छा अर बोरा जी ज्वान नयां-नयां मास्टर,  सि अल्मोड़ा का छा, बड़ा गुरुजी जरा शांत सुभौ स्वभो का छा पर गुस्सा औण पय्यां स्वटै बदिन चटम चटेल देंदा छा, ज्वान गुरुजी गुसैला पर मार्दा कम छा, द्वियों मा पढ़ाणैं होड़ रैंदि छै। कबि रातिम जब नौना निन्दन डगमग कन्न लग जांदा छा त गुरुजि लोग किस्सा कानी सुणौंदा छा। कानी पर सब्यों कि आँखि टक टककार अर कंदुड़ा खड़ा रैंदा छा। कब्बि-कब्बि पढ़ै पैटर्न बदलणा अर जिज्ञासा वास्ता गीत, काथा चुटकिलों को कंपीटिशन रखदा छा। ब्यखुन्दा सब्बि विद्यार्थी अपणा घौर बटिन खाणु खै आंदा छा। कब्बि-कबार क्वै बासी भात खै संतोष करदु छौ। गुरुजि लोग सब्यों तैं जरूर पुछदा छा, अरे लड़को खाणु खायि नि खायी रे। बासी भात वळौं तैं  गुरुजी पक्का रोटी खलान्दा छा। जाड़ों रात एक टैम चा पक्की मिल्दी छै। चा मा गुड़ौ ठुंगार भी चल्दु किलैकि गिरेन मा चीनी कम आदि छै। बार-त्यवार मा गुरुजि कैका वख जाऊं कख ना, फिर बुज्यड़यूं ढेर लग जांदि छै। हैका दिन हम सब घर-घर का स्वाळि-पकोडयूं स्वाद लैन्दा छा।

      इनि नि छौ कि केवल पड़ै-लिखै अर संस्कारों वळि बात होंदी होली, मौका मिळण फर बाळापनौ उकत्याट कख शांत बैठ सकदु। जरा सि गुरुजि भैर या इनै-उनै क्या लगि हमारु खिखच्याट शुरु, कब्बि-कब्बि त ये खिखच्याट को रुप फौन्दरी मा बदल्योण बैठ जांद छौ। फौन्दर्या बि इन कि कंठी त पकड़यालि पर हाथ क्वी न उठौ। एक ब्वनु बेटा पैलि मारिक देखौ त हैकौ ब्वनु तु दिखो अर द्वी बळ्द जना म्यटयां रैन्दा।  दुसर मा आग मा घस्येड़ु डाळण वहौं कमि नि। कब्ीि-कब्बि फौन्दरी ये काम मा नौनि जरा हिम्मत वळी होंदी छै, स्या नौना फा एक-आद झपाक मारि भैर भाजी जांदी छै। कब्बि-कब्बि बोरा गुरुजि चुपचाप भैर किवाड़ बटि मजा ल्येन्दा छा। जब गुरुजि तैं लगि जांद कि बात बढ़ण वळि छ त वो खांसी कैरि बोल्दा छै ऐ बच्चों क्यों हल्ला कर रहे हो ? गुरुज्या भितर औण से हि सिकैतै झमाझम बर्खा, जी इसने पैलि मेरे को माँ की गाळी दी। ना गुरुजी इसने पैले बोला कि तेरा बाप कल्यो खाव्वा बल। गुरुजि इसने मेरी कौपि मा स्यायी फरायी। गुरुजि इसने ही पैलि बळद उज्याडै बात छैड़ी। पता नि कथगै परकारे सिकैत हौंदि छै जौं तैं गुरुजि एक स्वट्या मा निबटै देंदा छा।

 

 

@ बलबीर राणा ‘अडिग’

मटई चमोली


 

Tuesday, 13 August 2019

सबसे सुंदर बेटी


बुबा तुम ते मुख पर
कति परकारो क्रीम
लपोड़ी लपोड़ी
विश्व सुंदरी बणणों ख्वाब दयखणा रावा
वा घाम मा तपि-तपी
संगसारे सबसे
खूबसूरत बेटी बणिगे।
@ बलबीर राणा 'अड़िग'

Saturday, 10 August 2019

अडिग शब्दों का पहरा: सरहद से अनहद

अडिग शब्दों का पहरा: सरहद से अनहद: कर्म साधना बैठै यति को सि द्धि का उत्साह नहीं स्वीकारा है समिधा बनना फिर होम की परवाह नहीं गतिमान वह समर भूमि में न दिवा ज्ञा...

Sunday, 4 August 2019

समै-समै की बात

ऐरां लठ्याळा
तुमुळ क्या जाण
प्यार पिरेम मा
रोणु रूसाणु
ज्यू का जज्बात
मन की बात
ज्यून्दा रैन्दा छाँ
जिन्दगी भर
वे कागजोंsक जमाना मा
इन नि होंदी छै
अंगुल्यों बदिन
स्वां डिलीट
जिंदगी भरे यादें।

@ बलबीर राणा 'अड़िग'

Wednesday, 31 July 2019

अगळ्यार


ब्याली बुबान पुर्यायी
आज तुम छाँ पुर्योंणा
भ्वोळ नोना पुर्याला
यू छिन अगळ्यार
जै कि बारी आयी
वेन गाड़ी दौड़ायी
सब्योंन अपणा बारा
गारा पिसण

घट का सल पर छः
यू सर्री पिसै
कैकु मैदा जन महीन
कैकु पींड जन दड़दड़ो
अर कैकी
भंवार* भी नि भर्यएंदी
भौंड़*  बणि मथि-मथि उड़ि जांद
हाँ, ये मा घटsन वत्गा र्फियोंण
चै नाज उड़ो या छिर्यों।

* भंवार = घट मु पिस्यां आटे ढांड।
* भौंड़ = पिसाई का दौरान उड़न वालो आटो।

@ बलबीर राणा 'अड़िग'

Wednesday, 12 June 2019

जीवन का चाचड़ी बन जाना


हे प्रभु ! हे ईश्वर ! मेरे कृष्ण, पीर और ईश
समभाव वाद रहित जीवन का दे आशीष
हर जन जीवन चाचड़ी बना देना
बेमनुष्यता इस धरा से मिटा देना।
जीवन का चाचड़ी बनना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है यह इस लिए कह रहा हूँ कि चांचडी बनने के लिए मनुष्य के विचार ही नहीं कर्मो का चरित्र के साथ समभाव होना नितांत आवश्यक है। लाख कोशिश के बाद भी सांसारिकता में रहते हुए मनुष्य के लिए समभाव होना असभव है, यह मनुष्य का दोष नहीं यह सांसारिकता की देन है जो हमारे हद से बाहर है। क्योंकि हम सब किसी न किसी वाद में बंधे है और वाद में समभाव नहीं हो सकता यह पोलियो ग्रस्त व्यक्ति का एवरेस्ट फतह करना जैसा है। मनुष्य का समभाव होना जैसे बुद्धत्व हो जाना निर्वाण होना है जिसमें जाति-धर्म, ऊंच-नीच, अगड़ा-पिछड़ा, महिला-पुरुष छोटा-बड़ा सवर्ण-दलित कुछ नहीं बल्कि मात्र मनुष्य का स्वयं होना होता है। चाचड़ी ऐसी ही अपने आप में निर्वाद गुण समाये हुए है, इस खेल में हमारा लोक जीवन क्षणिक समय ही सही वाद रहित हो जाता है, स्वयं में आनंदानुभुति। चाचड़ी/झुमैलो को लेकर यह मेरा निजी आंकलन है इसका किसी ग्रंथ या साहित्य पृष्ठभूमि से कोई सरोकार नहीं है हां लोक संस्कृति, कला और साहित्य विदों का आश्रिवाद अपने विचारों पर जरूर चाहता हूं। एक बात और स्पष्ट करना चाहूंगा कि चांचडी खुद में निर्वाद और समभाव है बशर्ते चाचड़ी पोषक लोक समभाव नहीं हो सकते क्योंकि वे भी तो किसी वाद के हिस्से हैं मैं खुद शामिल हूँ यह मात्र चाचड़ी के गुणों का आंकलन है।
  चांचडी को उत्तराखंडी लोक संस्कृति की रीढ़ कहा जाय तो अतिसयोक्ति नहीं होगी। चांचडी हमारी लोक संस्कृति का पारम्परिक गायन नृत्य है, जो स्वयं में समभाव है, यही इस लोक नृत्य को विशिष्ट बनाती है। चांचडी को मैं समभाव इस लिए मानता हूं कि इसमें गीत भी है नृत्य भी,  समूह भी एकता भी, महिला भी पुरुष भी, स्वर भी ताल भी और सबको मिलाकर एक उमंग उत्साह आनंद का अतिरेक, कोई लिंग भेद नहीं कोई वर्ण भेद नहीं। जिस प्रकार से आसाम का बिहू वैसे हमारी चाचड़ी जिसे हर उम्र के लोग वाद रहित गाते हैं नाचते हैं खेलते हैं, इसे झुमैलो नाम से भी जाना जाता है इस लोक नृत्य में देव स्तुति से लेकर लोक परम्परा, सामाजिक गीत, प्रकृति महिमा, प्रेम गीत, विरह गीत, समसमायकी गीत और हास्यव्यंग शामिल है या यूं कहें कि जीवन के विविध रगों से सजा लोक नृत्य है।  मेरे उत्तराखंड में चाचड़ी के विविध रूप हैं जिसमे चौंफुला, थडिया, तांदी, छौपती, छोलिया आदि, जो स्थान विशेष और लोकाचार पर आधारित हैं और पौराणिक काल से पीढ़ी दर पीढ़ी अपने लोक के साथ चलते आयी हैं। बस आज इस बात का दुःख है कि यह सांस्कृतिक धरोहर गांव घर से निकल कर आज पाश्चात्य लोकलुभाव गीत संगीत और डिजीटल वाद्ययों के साथ रंगमंचों तक सीमित रह गयी है नये कलेवर में। लोक की कला लोक से विमुख हो गयी इन कारणों पर फिर से विचार करने के साथ क्रियान्वयन करने की जरूरत है।
@ बलबीर राणा 'अड़िग'