धर्ती पर जीवन संघर्षों वास्ता च, आराम त यख बटिन जाणा बाद, ना चै किन बी कन पड़ल, ये वास्ता लग्यां रावा, जत्गा देह घिस्येली उत्गा चमक, उत्गा संचय जु यख छुटलू। @ बलबीर राणा 'अडिग'
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Saturday, 10 August 2019
अडिग शब्दों का पहरा: सरहद से अनहद
अडिग शब्दों का पहरा: सरहद से अनहद: कर्म साधना बैठै यति को सि द्धि का उत्साह नहीं स्वीकारा है समिधा बनना फिर होम की परवाह नहीं गतिमान वह समर भूमि में न दिवा ज्ञा...
Sunday, 4 August 2019
समै-समै की बात
ऐरां लठ्याळा
तुमुळ क्या जाण
प्यार पिरेम मा
रोणु रूसाणु
ज्यू का जज्बात
मन की बात
ज्यून्दा रैन्दा छाँ
जिन्दगी भर
वे कागजोंsक जमाना मा
इन नि होंदी छै
अंगुल्यों बदिन
स्वां डिलीट
जिंदगी भरे यादें।
@ बलबीर राणा 'अड़िग'
तुमुळ क्या जाण
प्यार पिरेम मा
रोणु रूसाणु
ज्यू का जज्बात
मन की बात
ज्यून्दा रैन्दा छाँ
जिन्दगी भर
वे कागजोंsक जमाना मा
इन नि होंदी छै
अंगुल्यों बदिन
स्वां डिलीट
जिंदगी भरे यादें।
@ बलबीर राणा 'अड़िग'
Wednesday, 31 July 2019
अगळ्यार
ब्याली बुबान पुर्यायी
आज तुम छाँ पुर्योंणा
भ्वोळ नोना पुर्याला
यू छिन अगळ्यार
जै कि बारी आयी
वेन गाड़ी दौड़ायी
सब्योंन अपणा बारा
गारा पिसण
घट का सल पर छः
यू सर्री पिसै
कैकु मैदा जन महीन
कैकु पींड जन दड़दड़ो
अर कैकी
भंवार* भी नि भर्यएंदी
भौंड़* बणि मथि-मथि उड़ि जांद
हाँ, ये मा घटsन वत्गा र्फियोंण
चै नाज उड़ो या छिर्यों।
* भंवार = घट मु पिस्यां आटे ढांड।
* भौंड़ = पिसाई का दौरान उड़न वालो आटो।
@ बलबीर राणा 'अड़िग'
Wednesday, 12 June 2019
जीवन का चाचड़ी बन जाना
हे प्रभु ! हे ईश्वर ! मेरे कृष्ण, पीर और ईश
समभाव वाद रहित जीवन का दे आशीष
हर जन जीवन चाचड़ी बना देना
बेमनुष्यता इस धरा से मिटा देना।
जीवन का चाचड़ी बनना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है यह इस लिए कह रहा हूँ कि चांचडी बनने के लिए मनुष्य के विचार ही नहीं कर्मो का चरित्र के साथ समभाव होना नितांत आवश्यक है। लाख कोशिश के बाद भी सांसारिकता में रहते हुए मनुष्य के लिए समभाव होना असभव है, यह मनुष्य का दोष नहीं यह सांसारिकता की देन है जो हमारे हद से बाहर है। क्योंकि हम सब किसी न किसी वाद में बंधे है और वाद में समभाव नहीं हो सकता यह पोलियो ग्रस्त व्यक्ति का एवरेस्ट फतह करना जैसा है। मनुष्य का समभाव होना जैसे बुद्धत्व हो जाना निर्वाण होना है जिसमें जाति-धर्म, ऊंच-नीच, अगड़ा-पिछड़ा, महिला-पुरुष छोटा-बड़ा सवर्ण-दलित कुछ नहीं बल्कि मात्र मनुष्य का स्वयं होना होता है। चाचड़ी ऐसी ही अपने आप में निर्वाद गुण समाये हुए है, इस खेल में हमारा लोक जीवन क्षणिक समय ही सही वाद रहित हो जाता है, स्वयं में आनंदानुभुति। चाचड़ी/झुमैलो को लेकर यह मेरा निजी आंकलन है इसका किसी ग्रंथ या साहित्य पृष्ठभूमि से कोई सरोकार नहीं है हां लोक संस्कृति, कला और साहित्य विदों का आश्रिवाद अपने विचारों पर जरूर चाहता हूं। एक बात और स्पष्ट करना चाहूंगा कि चांचडी खुद में निर्वाद और समभाव है बशर्ते चाचड़ी पोषक लोक समभाव नहीं हो सकते क्योंकि वे भी तो किसी वाद के हिस्से हैं मैं खुद शामिल हूँ यह मात्र चाचड़ी के गुणों का आंकलन है।
चांचडी को उत्तराखंडी लोक संस्कृति की रीढ़ कहा जाय तो अतिसयोक्ति नहीं होगी। चांचडी हमारी लोक संस्कृति का पारम्परिक गायन नृत्य है, जो स्वयं में समभाव है, यही इस लोक नृत्य को विशिष्ट बनाती है। चांचडी को मैं समभाव इस लिए मानता हूं कि इसमें गीत भी है नृत्य भी, समूह भी एकता भी, महिला भी पुरुष भी, स्वर भी ताल भी और सबको मिलाकर एक उमंग उत्साह आनंद का अतिरेक, कोई लिंग भेद नहीं कोई वर्ण भेद नहीं। जिस प्रकार से आसाम का बिहू वैसे हमारी चाचड़ी जिसे हर उम्र के लोग वाद रहित गाते हैं नाचते हैं खेलते हैं, इसे झुमैलो नाम से भी जाना जाता है इस लोक नृत्य में देव स्तुति से लेकर लोक परम्परा, सामाजिक गीत, प्रकृति महिमा, प्रेम गीत, विरह गीत, समसमायकी गीत और हास्यव्यंग शामिल है या यूं कहें कि जीवन के विविध रगों से सजा लोक नृत्य है। मेरे उत्तराखंड में चाचड़ी के विविध रूप हैं जिसमे चौंफुला, थडिया, तांदी, छौपती, छोलिया आदि, जो स्थान विशेष और लोकाचार पर आधारित हैं और पौराणिक काल से पीढ़ी दर पीढ़ी अपने लोक के साथ चलते आयी हैं। बस आज इस बात का दुःख है कि यह सांस्कृतिक धरोहर गांव घर से निकल कर आज पाश्चात्य लोकलुभाव गीत संगीत और डिजीटल वाद्ययों के साथ रंगमंचों तक सीमित रह गयी है नये कलेवर में। लोक की कला लोक से विमुख हो गयी इन कारणों पर फिर से विचार करने के साथ क्रियान्वयन करने की जरूरत है।
@ बलबीर राणा 'अड़िग'
Tuesday, 11 June 2019
चला चांचडी बण्योला
तुम गीत गावा दग्ड़यो हम भौंणेड़ बण्योला
हम रांसो लगोला जब, तुम भौंण पुर्याला
भिज्यां ह्वेगी छल/कपट आवा हाथ मिलोला
मन्ख्यात की अँगवाल बोटी चांचडी बण्योला ।
तुम गीत गावा दग्ड़यो हम भौंणेड़ बण्योला
हम रांसो लगोला जब, तुम भौंण पुर्याला।
एक बाटा का बटोही छाँ हम तुम
क्वोख से सुरु अर मड़घाट खतम
धर्यों/पांजी वा सब यख छुटि जाण
तेरु जतन मन्ख्यात त्वे दंगड़ जाण
पोगी/पंथ कु जुगफा फुंड फरोला
बैरीपने की आग पिरेमल बुझौला ।
तुम गीत गावा दग्ड़यो हम भौंणेड़ बण्योला
हम रांसो लगोला जब, तुम भौंण पुर्याला।
सच्चे ये धर्ती की, सदानी क्वे नि रायी
यु माटी कैन खायी कतिन कमायी
रंगमंच च जीवन खूब नाचन गाण
खुंनस पाळी त्वेन यख क्या पठ्याण
ते ज्यू बांधी गेड़ मिलीजुली सुलझोला
मैती मांगल गै ये धर्ती मंगल बणोला।
तुम गीत गावा दग्ड़यो हम भौंणेड़ बण्योला
हम रांसो लगोला जब तुम भौंण पुर्याला।
उज्यालू ह्वो सब देळयों, ना रावो अन्ध्यारु
खाणी कमाणि छक्वेकी क्वे न ह्वो बिचारु
जणगण मन ह्वो कंठ, ह्वो भारत जै जैकार
विश्व बंधुत्व गुजोंला सरि दुन्या संगसार
एक भौंरा का म्वारि बणि बैरी झमटोला
सर्वे भवन्तु सुखिनः मंत्र सरा पृथि पौंछोला।
तुम गीत गावा दग्ड़यो हम भौंणेड़ बण्योला
हम रांसो लगोला जब, तुम भौंण पुर्याला
भौत ह्वेगी छल/कपट आवा हाथ मिलोला
मन्ख्यात की अँगवाल बोटी चांचडी बण्योला।
गीत : बलबीर राणा 'अड़िग'
Thursday, 6 June 2019
अगास
1.
तति ना फड़फड़ो
ज्युन जमाणो
आगास मा क्वे ठौर निsच।
2.
अगास मा जाणे
तति मंछा छ त
पंख लगाण पड़ल
पर ! मणखी... पंख?
मतलब ?.......बिदै।
3.
सर्ग थुकण
मौळ मुतण
ठिक निच बाबू।
4.
पिरेम हो त
धर्ती अर आगासो जन
जख धर्ती वख अगास।
5.
चै, धर्ती अगास
एक करा
होंण वी छ
जु राम रचि राखा।
6.
सबसे बडू रडार
वा नीली छतरी
वेsकि नजर से
क्वे नि बची
पाताळ भी।
7.
सुर्ज दगड़ अगास
नि ढुबद किलेकि
वेन जून/गैणो दगड़ भी
धर्ती रक्ष्या कन।
8.
सुदी नि ?
अगास मा छेद कन
मेनत कु बर्मा घुमण पड़द
पस्यो दगड़।
9.
अगास मा कैकी
घर/कूड़ी नि बसद
बादळ भी बर्खा बणि
धर्ती परे आन्द।
10.
अगासे चारे
अनन्त इच्छाओं पूर्ति तें
धर्ती जन धीर इरादा
जरूरी छिन।
@ बलबीर राणा 'अड़िग'
Sunday, 26 May 2019
ढै बीसी पार
सफेदी ऐ जांदी कंदुड़ा आस-पास,
मथि सफाचट या बच्यां/खुच्यां उदास।
आंख्यों का तौळ काळी लकीर,
मुख अनुभौ, ज्यू धृगम/धीर।
जिमेदरि फंची से ढळक्याँ कांधा,
मौ मदद अत्यड़ा बड़णे रांदा।
पुटुग उड़्यार या, थळथमकार,
तौळी/मौळी चीजों से खट्टा डकार।
टंगडों की सक्या कमती ह्वे जांदी,
पर, मन ज्यू कि सक्या बड़णी रांदी।
कुटमदरी सुख खातिर जतन जोड़,
सब्बि जगा अपणा ही हड़गा मरोड़।
गिरस्थी का होर पोर अफूं रिंगणु रैंदू
घर समाजा का बीच धिक्याणु रैन्दू।
भितरै कष्ट पीड़ा दंत कीटी सैंणु रैन्दू
ठिक छौं ब्वोली भैर मुलक्येणु रैन्दू।
भल का वास्ता घिसण/घिसाणु
ब्वलयूँ माना रे, हर बगत बिंगाणु।
अफूं से बड्या तौंकी होणी खाणी आशा
ढै बीसी पार मनखी अभिलाषा।
*@ बलबीर राणा 'अड़िग'*
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