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Sunday, 6 January 2019

माँकी कसम



 
रतनी काकाsन गौं मा पंच्यैत बैठै अपणा तिमिली झंग्रयाड़ घास च्वरण अर झंग्वरू कुर्चणा बाबत । शेरसिंगन माँकी कसम खै चतुर सिंह सिंगा नौsकी गवै पंचैत मा दये,  कि, भाई...मिन अपणा आंखोंन दयेखि चतुरु परसि रतनी काका का तिमली पुंगड़ा मा सुबेर सुबेर घास काटणु छै, अर मि थोड़ा खांसी बी त अगला भै चुप ह्वे झंगोरा पुटुग स्यान ह्वेगी, मि अदयेखी करि अपणा काम चल ग्यों मल गौं। पंच्येतन चतुरु से पूछी अरे चतरू क्या ब्वनो रे यू शेरसिंग ? त्वेन परसि छंछर बारा सुबेर रतनी तिमली पुंगडों घास सच्ची काटि । चतुर सन्न रैगी ब्वलौं त क्या ब्वलौं... मन ही मन सोचणु रो कि यार घास त मिन काटी नि पर यू आदिम कति भरोसा से माँकी कसम खाणोs, हे राम कन कलजुग आयी यू, जु माँ पृथवी से बी बड़कर च, स्वार्थी मणखी अपणा स्वारथ का वास्ता वे खुणि बी नि बक्सणि, हे परभू  क्या ह्वलू अग्ने अब ये धरती को। 
सरि पंच्यैत गुण-मुण, गुड़-मुण कन बैठिग्ये, चतुरुs चुप रौंण पर लोगों तैं होर यकीन होंण लगि, चतुरु पर कि ये की करामात च यो, पर ! पच्चास पार पौंछि दानु सयाणु मणखी यनु गलत काम कनै कर सकद, रैन्दू क्वे छवsरा छौराs त बात मान बि सकद।
तबरि रतन सिंगे जनानी थ्यपुली काकी पल खौळ बटिन मुंड टोखरु जन बणे हिंकर फिंकर करि आयी अर चटमताळी गाळी देंण लग्गे, हे कन जड़ घाम लगि रे त्येरी, त्वे तैं अपणी आस औलादे नि छ रे रांड मस्ता !   हरे ! दुश्मनोs घास त काटि त्वेन पर वे झंगोरा डालौं क्या बिगाड़ी तेरुs....हेरां....कन निरासपंथ ह्वे त्वेखुणि रे रांड मस्ता, कन झगुली त्वपळी घाम लगि रे त्येरी। हेरां कन गर-गरा बाळड़ा ह्वयां छाँ तख ।  मेरी सरुsन कमर त्वडी म्वोळा  थूपुड़न थुपड़ायी छै वा पुंगडू,  जड़ नास हव्य यनु दुर्बीजों, वे भैंसी कचिना कीड़ा पड़ी जैन मेरु लड़बड़ी डड़यळी खैंन, नि खाण पय्या ऐसूं बग्वाल। थ्यपुलि काकी यनि एक लगीं छै कटमचुरै गाळी देणि च्वोरुं तैं ।
सरपंचजिन रतनी तैं डांटि यार रतनी इनि पंच्यैत मा जनानियों गाळी गलौज कण ठिक नि भै। बौ तैं बोल तेरु न्यौ निसाब ह्वे जैलू तू यख पंच्यैतो माहौल गरम न कर। फुंड जौ रांड यखमु बबड़ाट न कैर निथर ? अर रतन सिंगन जांठी उठै कि थ्यपुली काकी उन्द भगैन ।
थ्यपुली काकी जाणा बाद महौल  कुछ सांत ह्वे त सरपंचsन चतुरु से फिर ब्वोली भाई चतुरु तेरु अन्यौ त करयूं च त्वेन अपणी सफै मा होर कुछ ब्वन त बोल ?  निथर ? चतुरन बोळी ना दिदा ना..मिन कुछ नि ब्वन गवै देंण वळाल जब माँs क़सम खयाली त ये मा होर कुछ ब्वने गुंजैस नि आप पंचपरमेसुर जन बी दंड दयेला मितें मंजूर च, मेरी हिकमत नि माँs कसम खाणे जैल बी खायी एक बार खैल,  सफै दये कि एक हौर कसम खये जाण।  वे माँ फ़र हौर अन्यौं ठिक नि, यू स्वारथी दुन्यां क्या जाणद माँ खुणे, घास जैन बी काटि काट्यली सजा मि पर लगै दया, कम से कम फिर वे मां व्येजति न ह्वो जू हम सब्यों तें पळणी वळी च।
@ बलबीर राणा 'अड़िग' 

Thursday, 20 December 2018

वे दिने बात


***वे दिने बात***
ऐजा सांखि लगि जा जरा, जाणो बगत ह्वेगी
फेर इकुलांसे  पिड़ा मा बिब्लाणो बगत ऐग्ये।

भ्वोळ बटिन न तु ह्वेली न मि सामणि ह्वलू
अग्ने उनि बडुली मा रैबार पैटाणो बगत ऐग्ये।

समाळी धैर आँख्यों का मोती जरा हैंसी जा
जांदा दौं तौं हाथियूं भुकि प्याणो बगत ऐग्ये।

ओ काखि बैठि जा घड़ेक छविं/बत लगौला
फेर गीरस्थीsक बाटू यकुली कटणो बगत ऐग्ये।

द्वी गफ्फा खल्लै दे तौं  हाथोंsन, धौ कैर दये
बिनबर्खो च्योली जन तिसलू रोणों बगत ऐग्ये।

मिन त फुर्र उड़ी जांण पंछी बण वे परदेश मा
राती दिन तेरु वा फोन मा रुसाणो बगत ऐग्ये।

चल पैटे दे पिठ्ठू मेरु अपणी समोंण बी पांजी दे
आंख्यों मा त्येरी सुवा आंसूं तबराणो बगत ऐग्ये।

@ बलबीर राणा 'अड़िग'

Wednesday, 5 December 2018

वे युग पुरुष की अमर गाथा


हे उत्तराखंडी नैनवांणों इतियास तुमतें बताणु छौं
देवभूमि का वे युग पुरुष की  गाथा सुणाणु छौं।

पंद्रह सौ नब्बे दशक मा एक वीर पैदा ह्वेनी
वीर सौंणबाग भंडारी का घोर वेन जलम लीनी
जैsकी गाथा जुगबटिन ये गढ़भुमी मा गुंजणी रै
वीरभड़ माधो सिंह भंडारी नाम से वा अजर अमर ह्वे।

वे युगपुरुष की तागत को ऐसास तुमतें कराणु  छौं
हे उत्तराखंड .........

बाळापण से उटंगरी रे वा होंणहार चतुरछंट छै
लौंची उमर मा जी गढ़सेना कु सिपै बणिगे छै
वीर क्या वा भड़ क्या एक महारणपति छायो
गढ़ नरेश महीपति शाह को शूर सेनापति ह्वायो।

एक महानायक सेनाध्यक्ष की वीरता तुमतें बताणु छौं
हे उत्तराखंड .......

ज्वान मा को ज्वान छै वा दवफरी सी भडांग छै
आगो जन भभकार छै वा उदमातो फौन्दार छै
अपणी जलमभूमि का खातिर कत्गा लड़ै वेन लडिंनी
कति दुश्मनो मुंड म्वडिंन, कत्गों की धौंड़ धड़केनी।

यना वीर की वीर गाथा तुमतें मि बिगाणु छौं
हे गढ़भूमि का नैनवाणो......

मालों का वे महाकालsन, हूण दापों को छक्का छवडेनी
भारत चीन बोर्डर जोन वोड़ा मुँडरा गाड़ दयेनी
पाsड़क पुटुग सुरंग बणाण वाळू दुन्यों पैलु इंजीनियर ह्वायू
अपणा बेटो कु बलिदान करि वा पाणी कूल बगै ल्यायो।

यना परोपकारी मणखी कु सत तुमतें समझाणु छौं
हे उत्तराखंड का .......


थाती माटी का खातिर यनु भगिरथ काम करिगे वा
जन्मजमान्तर का वास्ता मलेथा को उद्दार करिगे वा
एक सिंह बण को, एक सिंह गाय को
एक सिंह माधो सिंह, हैकू सिंह काहे को
इना महाशेर कु शूरत्व आज तुमखुणे दिखानु छौं
हे उत्तराखंड का ......

मणखी छै वा अनमणमाथी को राण्यों को रौंसिया छै
अपणो खातिर मयाळू मायादार फूलों को वा हौंसिया छै
एक बार को  विजय रथ तौंकु छवटा चीन तलक गैनी
निर्भगी बीमरी लगी जु सदानी तें घर बौडी नि ऐनी।

मृत्यु शय्या पर बैठ्यां वे पुरूष की रणनीति तुमतें बताणु छौं
हे उत्तराखंड का.....

साहसी निडर ते भड़न,आखरी दों सिपैयों तें समझायी
मेरा मरणे खबर दुश्मनो तें पता न लगण दयायी
निथर तुम एक भी ज्वान घोर बौडी नि जाला
दुश्मन तें अगर पता चलि त तुमतें यखी लमडे दयला।

वे गढ़भुमि का रणबांकुरे आखरी ख्वाइस बिंगाणु छौं
हे उत्तराखंड का.....

लड़ने रय्या पिछने हटणे रय्या घोरsक बौडी जयां तुम
मेरा शरील तें तेल मा लपोड़ी हरिद्वार मा जगे दियां तुम।
ये बीर गाथा परमाण इतियासकारों की कलम बतै दयली
त्याग समर्पण की मिशाल मलेथा खुशाली तुमतें समझाली।

देवथाती का युग पुरुष की प्रेरणा तुमतें सुझाणु छौं
हे उत्तराखंड का .....

*** वे समै मा मलेथा कु लोक व्यवहार***

बारा बित्या मास अर छई ऋतु चली गैनी
बारा ऐनी भेलो बग्वाली सोला शरद पूरा ह्वेनि
सब्बि ऐना घौर बौड़ी की, मेरु माधो किले नि ऐनी।

करुणा कनि रे राणी बौराणी, धरती पछाड़ खाणी रैनी
हिन्क्वाण पड़ी रो गौं ख़्वाळो, हाथ न क्वे धाणी लगीं
सब्बि ऐना घौर बौड़ी की, मेरु माधो किले नि ऐनी।

चौंल छड़याँ का छड़याँ रैग्यां दाल दौलीं की दौळी रैनी
ऊनि रैग्ये बासमती च्युड़ा, थौलो कांकर टंग्यों रैनी
सब्बि ऐना घौर बौड़ी की, मेरु माधो किले नि ऐनी।

हे मेरा नैनवाणों यू छै वे बीरभड़ माधो की कथा
स्वोना आंखरों से लिख्यों  रैलू वे पुरुष की शौर्य गाथा ।

रचना : बलबीर राणा "'अड़िग'

संकलन सभार:-
हरिकृष्ण रतूड़ी रचित और श्री डॉ यशवंत सिंह कटौच द्वारा संपादित एवं संशोधित गढ़वाल का इतिहास, डॉ बीरेंद्र सिंह बर्तवाल रचित गढ़वाली गाथाओं में लोक और देवता और डॉ नंदकिशोर हटवाल जी के ग्रंथ चांचडी झुमाको