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Sunday, 22 March 2026

कविता

 कविता बथौं जान

हिंदी में, 

बस मासूस होन्डी 

कबी वाइवेट सुरसुरा 

कब्बी टटगर ह्यूं सैड 

कबी ताति तोळाबोळ लू,

फेर 

शब्द पकड़ी 

कागज मा बिख़दरी

काका हिया सेटदी 

काका हिया उठदी 

अरे, एक और बल 

माळा गोरू धौळे-धौळ। 



Tuesday, 17 March 2026

अनंत पिरेम

यनु लगदू जन
मिन त्वेतैं अनगिणत रूपों मा 
अनगिणत बार पिरेम करे
जलम-जलमान्तर, जुग-जुगान्तर तक
सदानी वास्ता। 

मेरा मंत्रमुग्द ज्यून गीतों कु हार बणे 
अर  
बार-बार बणे
जै उणि तिन समूण रूप मा स्वीकार करी
अर 
अपणा कतिगा रूपों मा गौळा पैरिन
जलम-जलमान्तर, जुग-जुगान्तर 
सदानी वास्ता ।

जबार बि मि मायै साख्यूं पुराणी 
कथा कानि सुणदू 
त उनि पीड़ा विरह विछौ 
या 
दगड़ मंगे रंगा-चंगी सुणदू
ज्वा जनातनि छ साख्यूं बिटी। 

मि जनु-जनु अतीत मा द्योखदो
त वख तू ही प्रकट होन्दि
बगता अंध्यारा उणि चीरदी,
धुर्व तारा का उल्याला मा 
चमकदी दमकदी स्वाणि।  
अर, तब तू 
यनि तस्वीर बणि सामणि आन्दि
जै तैं युगान्तर भूलि नि जै सकदन। 

हम द्वियां वीं सदानीरा गदनै धार बिटे
बगदा यख पौंछयां 
ज्व मौळयाण बिटी आन्दि 
ज्वा कब्बी बुसदी नि।

बगदा बगता केन्द्र मा 
हमारो पिरेम 
वे जगतकर्तान निहित करि, 
ज्व शास्वत छ।

हमु द्वीयून लाखों मायादारों दगड़ खेलि
अर, वूंद दगड़ एक नस्या बगत साझा करि
मिलणें सर्मयिळ मिठास 
अर 
विदै का उनि दुख्यारा आंशू।

हमारो पुराणू पिरेम छ 
पर यु पिरेम युगान्तर 
ज्वान ज्यू मा जीवंत रैलो
येन कब्बी बुढेन्दो नि।   
 
आज मेरु पिरेम 
तेरा चरणों मा लमपसार ह्वेगे
यीं तैं अपणू अंत त्वे मा ही मिली।

हमारो यु
पिरेम हमेस मनखी अतीत मा रयूं
अर 
भबिस्या मा बि  रैलो 
धरती पर जुगों तलक।

यु छ
अनंतकालौ पिरेम 
सार्वभौमिक आनंद, 
सार्वभौमिक दुःख 
सार्वभौमिक जीवन। 
अर सब्बी पिरेमे स्मृतियां 
हमारा यीं पिरेम मा रळै-मिळेगे
अर 
रळै-मिळेगे 
अतीत अर अनंत काल का 
हर कवि का गीत।

रविन्द्रनाथ टैगौर 
अनुवाद :- बलबीर राणा Adig

Monday, 9 February 2026

सजल

हर काम मा शरीलौ रगड़ा किलै करे जौं, 
सौ-सल्ला मा होंणू त, झगड़ा किलै करे जौं।

 जब वूं थैं ही नि हमारी क्वी परवा-फिकर, 
 त वूंकि चिंता मा तौळाबोळि किलै करे जौं। 

 दूर रैकि हि सब्बि निभैणू छ सौजि सजिलो, 
फेर नजीका वास्ता फबत्याट किलै करे जौं। 

 इथगा गनीमत कम नि कि हम बैरि नि छन, 
पर खासमखास होणू कबत्याट किलै करे जौं। 

 एकि गळज्यू पाणी दोस्ती ख़तरनाक होंदी बल, 
त गळज्यू बणे दगड़यूळ तैं खतरा किलै करे जौं। 

 अडिग जब मर्जिल नि होणू मन मर्जी कु काम, 
 फेर हैका कि मर्जी तैं, मर्जिल किलै करे जौं। 

 1 फ़रवरी 26 

 @ बलबीर राणा 'अडिग'

आँख बंद कौरि नि पै सकदन अंधै नजर

आँख बंद कौरि 
नि पै सकदन 
अंधै नजर 
जैका झफ्फक्वळि दूरी पर छ पूरी नजरै दूरी। 

 फजल झुकमुक अँध्यारा मा 
खग्रास घामो उदै होन्दू 
अर 
अँध्यारा मा एक हौरि घणो अँध्यारौ फ़ैल जांद, 
जुन्यळि पर जादा काळा धब्बा होला जूनी अर गैणो का। 

 झफ्फक्वळि लगै ही 
जाणि सकदन धार (क्षितिज)  तैं 
नजरा बोम तैं 
 कि 
सु कै आळा मा धर्रयूँ होलू 
अगर 
धर्रयूँ बि त 
कै अँध्यारा खूँटा पर टंग्यूँ 
कै नक्षत्रौ अँध्यारो। 

 आँख बंद कोरि द्योखण 
अंधा जनु द्योखण नि। 

 कै डाळा छैल मा 
कै सड़का किनारा घिमसाण घ्याळा बीच 
कुर्सी बुणदो एक अंधा 
दुन्यां दगड़ सबसे जादा पिरेम करदूं 
सु झफ्फक्वळि मा कुछ दुन्यां तैं स्पर्श करदूं 
अर 
भौत दुन्यां तैं स्पर्श कन चांन्दो। 

@ विनोद कुमार शुक्ल 
Anuwad :  बलबीर राणा 'अडिग'

Sunday, 25 January 2026

मनहरण घनाक्षरी

हरि-भरि डांडी कांठी, हियूँल ढकिन चांठी, संगता सुफेदी जांठी,धर्ती बणि स्वाणि चा। जड्डू-जुड्डू ठंडू-मंडु, कौंपि-कूंपि लगि रन्दि, जीवन जतन गाणि, काम-काजै स्याणी चा। डाळि बोटि झकमक, पौन पंछी रक-बक, बोन्ना हम जौऊं कख, असन आतुरी चा। मनख्यूं कि आग साग, खंतड़ा मंतड़ा राग, गाजि -मूजि बिचरों थैं, झड़ द्यो यु भारी चा। बुढया बिराळा जाता, दिन-रात आग तापा, तति मा बि झझराटा, कुच्यां रंदा चुल्ला चा। बाळा भगवान रंदा, नंगा धंगा चंगा होंदा, जड्डू यूँ कु ढूँगा मांग, होंदा बाळा ठुला चा। @ बलबीर राणा 'अडिग'