यनु लगदू जन
मिन त्वेतैं अनगिणत रूपों मा
अनगिणत बार पिरेम करे
जलम-जलमान्तर, जुग-जुगान्तर तक
सदानी वास्ता।
मेरा मंत्रमुग्द ज्यून गीतों कु हार बणे
अर
बार-बार बणे
जै उणि तिन समूण रूप मा स्वीकार करी
अर
अपणा कतिगा रूपों मा गौळा पैरिन
जलम-जलमान्तर, जुग-जुगान्तर
सदानी वास्ता ।
जबार बि मि मायै साख्यूं पुराणी
कथा कानि सुणदू
त उनि पीड़ा विरह विछौ
या
दगड़ मंगे रंगा-चंगी सुणदू
ज्वा जनातनि छ साख्यूं बिटी।
मि जनु-जनु अतीत मा द्योखदो
त वख तू ही प्रकट होन्दि
बगता अंध्यारा उणि चीरदी,
धुर्व तारा का उल्याला मा
चमकदी दमकदी स्वाणि।
अर, तब तू
यनि तस्वीर बणि सामणि आन्दि
जै तैं युगान्तर भूलि नि जै सकदन।
हम द्वियां वीं सदानीरा गदनै धार बिटे
बगदा यख पौंछयां
ज्व मौळयाण बिटी आन्दि
ज्वा कब्बी बुसदी नि।
बगदा बगता केन्द्र मा
हमारो पिरेम
वे जगतकर्तान निहित करि,
ज्व शास्वत छ।
हमु द्वीयून लाखों मायादारों दगड़ खेलि
अर, वूंद दगड़ एक नस्या बगत साझा करि
मिलणें सर्मयिळ मिठास
अर
विदै का उनि दुख्यारा आंशू।
हमारो पुराणू पिरेम छ
पर यु पिरेम युगान्तर
ज्वान ज्यू मा जीवंत रैलो
येन कब्बी बुढेन्दो नि।
आज मेरु पिरेम
तेरा चरणों मा लमपसार ह्वेगे
यीं तैं अपणू अंत त्वे मा ही मिली।
हमारो यु
पिरेम हमेस मनखी अतीत मा रयूं
अर
भबिस्या मा बि रैलो
धरती पर जुगों तलक।
यु छ
अनंतकालौ पिरेम
सार्वभौमिक आनंद,
सार्वभौमिक दुःख
सार्वभौमिक जीवन।
अर सब्बी पिरेमे स्मृतियां
हमारा यीं पिरेम मा रळै-मिळेगे
अर
रळै-मिळेगे
अतीत अर अनंत काल का
हर कवि का गीत।
रविन्द्रनाथ टैगौर
अनुवाद :- बलबीर राणा Adig