Search This Blog

Monday, 17 November 2025

विकास होगा तो



विकास होगा तो
सुनिश्चित हत्यायें होंगी
किसी पहाड़ की, पेड़ पदपों व
इन पर आश्रित जंतुओं की
साथ में पूरे पारिस्थिकीय तंत्र की।

विकास होगा तो
संयम, धैर्य, सहनशीलता
बहुत अच्छी हालात से मरेंगे, और
द्रुतमार्ग पर द्रुत गति से भागेगा
दम्भ, औंछापन व हवाई प्रतिष्ठा।

विकास होगा तो
रुग्ण होती जाएगी
पारिवारिक समरसता
अपनापन, पारिवारिक व सामाजिक मूल्य
और, स्वस्थ-मस्त अट्टाहास करेगा
एकला-अकेला, नैराश्य एकाकीपन।

विकास होगा तो
निर्ममता से कुचली जाएगी
रीति-रीवाज, संस्कृति
खुशियों के नाम पर नाचेगी
वेहुदी नंगी उन्मुक्तता।

विकास होगा तो
वह सब अप्रत्याशित होगा,
कृत्रिम बुद्धिमत्ता आ गई
कृत्रिम आदमी आ गया
अब कृत्रिम जीवन भी आएगा
यकीनन आएगा।

@ बलबीर राणा 'अडिग'
17 Nov, 25

Thursday, 13 November 2025

नाकै लौंग




फजल जनि घामै झौळ खिड़की बिटि भितर आयी, साकम्बरि ददि का कन्दूड़ बाजिन या सच्चिगो सूणी होलू। अरे दां, परमा दादा चलिग्यौं बल ब्याळी। परमा दादा चलग्यूँ ? पर कख ? पोरों साल त सुणण मा आयी कि सु कै बृद्ध आसरम मा छ जिन्दगी काटणू। क्या तै बृद्ध आश्रम बिटि चलिग्यूँ या यीं धर्ती बिटि। साकम्बरी ददि झस्स झसकिन अर वींकु गात झझर्राट कन लेगे । भितर बिटे एक तौळा-बौळि। क्या सच्ची ? स्या खौड़ स्वरण छौड़ी सरपट खौळा ढिस्वाळ मा ऐन, इना-उना देखी त क्वी नजर नि आयी। पूछदी त कैमा ? जैकि बाच सुणण मा आई सु त चलग्यूं म्येल्यों। क्वो छौ वा ? बाटै कूड़ी, दिन भर बाटापन कति औंणा-जाणा रन्दन। 
बाच त तै पला ख्वाळा मंसारामै जनि छै लगणी, पर कख भाजी सु भाट यति छांट। ? सु मंसाराम भाट बि भटकणू रैंद सुबेर बिटिन ब्यखुन्दा तलक सर्रा गौं-मुल्क मा नारद मुनि जनु। मनै-मन बडबड़ान्द ददि कु मन सर्रा पृथी रिंगण लग्यूं अर स्या झप्प बैठिगे तखमु खौळा डीप मा। जितम धकध्याण लेगे। हे ब्वे ! यु क्या सूणी मिन ? अर स्या अफूं मा यी सवाल-जबाब कन लगिं।
एक ज्यू बोन्नू हे राम सच्ची त नि चलग्यूं निर्भगी मथि? दुसरु ज्यू बोन्नू कि, जाण द्या रे !  मेरु क्या गयूँ। मेरु क्या रिस्ता छौ वे दगड़। क्या लगद रे साकम्बरी सु तेरु, जै ऊणि यति म्वन बचण होण लग्यूं ? क्या दिनी वेन त्वे तैं? जिन्दगी भरा आँसू ! तिसाळी माया। दुन्यां कु तिस्कार ? भाज्यूं छौ सु र्निभगी किलक्वारी मारद जुंगड़ौ नोना तैं छोड़ि। हट !... जाण द्या मस्ता तैं । जख बि जाउन। मथि जाउन या मुड़ि। अर स्य मन ज्यू तैं जरा ठौ द्योण लगीं । पर ! मन कै अनिष्ठ भै मा थर्रथराण लेगे अर ज्यू खाड़ मुड़ि खडयीं माया तैं खरौळण बैठगे । 
अरे निर्भगी ना बोल ? क्या बोन्नी तू, कि क्या रिस्ता च तै दगड़ ? आखिर तैका नौ कि तू यीं बुढ़ापा तलक नाक मा फुल्ली पैरणी। फुल्ली..। हौं रे... लोंग पैरणी। 
ऐ ब्वे !..... क्या अब मि विधवा ह्वेगी ? ऐ ना रे ना !... यनु निरासपंथ ! ना भै ना।
अर वींका हियारमल भितर बिटि किल्ल किलक्ताळ मारि। स्या चड़मताळ खड़ि उठिन अर खौळा डीप बिटे फेर इना-उना हैरण लगी। अर अन्दा बिमोळी मा ज्यू भितर धाद लगाण लेगे। ऐ मंसा। ऐ रे मंसाराम ? मास्तों कख भाज्यूं रे तू ? बोलि द्ये कि तिन मैं खिजौैणा वास्ता मजाक करि। झूठौ रैबार छ या। पर नजर का आखिर कूणा तक तैकु क्वी अत्तस-पत्ता नि छौ। फेर मनै-मन सोचणि कि परमा सच्ची कु मौरिगे क्या ? 
अर जबाब बि अफूं ही द्योणि कि कख बचण छौ तेन तै बृद्ध आसरम मा। अरे र्निभगी पितरौं मड़ान बि नसीब नि ह्वे त्वे तैं। हेरां कुलक्षणी कैन करि होलि तेरि गत्ति तख तै परद्योस मा। कैन करि होलि तेरि कपाळ क्रिया ? त्वे उणि केन मूंडी होलू मुंड ? हजार परकारा सवाल। द्वी-द्वी नौन्याळ छन तेरा ज्यून्दा जागन्दा पर त्वे कुलक्षी तैं भलो जीवन रास नि ऐन।  
कै हैंका जगा जाणें बात रन्दि त सु मंसाराम सदानि चारै यखमु ऐ टक्क लगै काटण लगान्दू, कि बौजि मिन फलाण-फलाण बात सूणि परमा भैजी बारा मा। पर.... आज जब बात सच्ची होलि त तब्बी त तेन अलुकां ह्वे मेरा कन्दूड़ा मा खबर डाळि अफूं अलुका ह्वेग्यं। साकम्बरि ददि सोचदी धम्म भुयां खौळै दानणी पर अड़ासू लगै बैठिगे, अर ज्यू भितर हिंकरा-फिंकर डाड मन लगि। मन अर ज्यू कु कणाट भैर ना ओ, जिमत कटकटौ कने कोसिस कन लगि कि तै उणि मिन एक डाड नि मन, दाँत कट्टी लगै स्या चुप्पऽऽ... सन्नऽऽ....! 
स्या ददि स्ये छज्जा अर घुर्रपळै पठाळ तैं करि-करी ह्वे घूरण लगि, ज्वा वींकु अपणी ज्वान पीठी मा बौकि लयीं छै। तै कूड़ि तें हैरण लगिं ज्वा वींका ज्वान पस्यौ बदिन बण्यूं छौ, तौं मौर-संगारौं तैं हैरण लगिं ज्व वींका गोळा हंसुळौ बेची धनि मिस्त्रिन बणै छौ। क्या त्याग नि करि मिन यीं कूड़ी बाना अर मितैं क्या मिली स्याळ-न्याळ जीवन भरौ तरास ?  पस्त-पलौक तै दानणी अड़ासा पर पसरि ददि वीं दुन्यां मा घुमण लैगे जबार बिटे वीन तै परमानन्दौ हाथ पकड़ि छौ लौंची उमर मा। 
अजक्याल चौं तरिफां धर्ती बसंत का ज्चानि उलार मा छै मगन होयीं। आड़ू खुमानी डाळा फुन्नौ बदिन झकमककार लकदक छां होयां, तौं फुन्नौ पर भौंरा अर म्वारियां छै गुनगुनाणा। डाळौं मा पौथल्यूं छौ किबचाट मचायूँ। साळी अग्ने आँखोड़ा डाळा मा घुघतौं घुरघराट छौ लग्यूं। ये साल वलि सार गिवांड़ि अर पल्ली सार सट्याड़ि छै लगी। लोग बाग अजक्याल गिवांणू मा छा मौळ ढौळणा अर सट्याड़ियूं मा यग्वोड़ लगाणा। तबार तक सुबेरौ पिंगळू घाम साकम्बरी ददि द्याळ बिटे चार पुंगड़ा उन्द तक चलिग्ये छौ। हरीं-भरीं गिवांण सारि मा ग्यूँ चौपत्या ह्वेगे छै अर लय्यां पिंगळा फुन्ना सुरसर्या बथौं दगड़ चांचड़ी छै ख्यौलणा। पल्ली सार सट्याड़ियूं मटमैलो रंग अज्यौं तलक उनि छौ किलैकि साटी झंगौरु अज्यूं एकपत्या ही छौ होयूं। 
गौं-द्येळयूं मा फजलौ अन्वेणि-कल्यौ र्वटि छै पकणि। ये बातै गवै घामैं किरणों दगड़ घौर-घौर बिटे अगास मा उठदी धुवैं लकीर द्योणि छै। दगड़ मा घर-घर बिटे औन्दि फरणा छौंके खुसबू। कुछेक बेटी-ब्वारी दथुली कर्छुला कुचाड़ी एक हैका तैं धादाम-धाद लगै बौंण छै दनकणि। कुछेक मर्द माणिक सट्याड़ियूं मा छां दनाळू मय्या लगौंणा। गौं कु सुरेश पंडेजी मंगरा बिटे नयै-धुयै पाणी बंटा कांधी धौरि अपणी धुन मा छौ गैत्री मन्त्र बड़बड़ान्द हिटणू। पर ददि तनि बेसुध छै खोयीं। 
चौं दिशों मा मधुमासै स्वाणी सुगन्ध छै फैलीं। बण बुराँसा फुन्नौ बदिन लालपट अर भीटा-पाखा फ्यूँलिन छौ पिंगळपट होयां। मुड़ी गाडा़ उदिस्याण मा हिलांसौ विरह बिलाप छौ सदानी तरौं, ह्याँ- ह्याँ। पार क्वेलाखा बौंण बिटे घ्वीडौं अड़काट छौ सुणेणों। आहा प्रकृति को यनु वैभव बंसत मा यी दिखेन्दो पर ददि तैं तै वैभव से क्या ल्हीण-दीण ? 
गौं-मुल्क सदानी चारै अपणि दिनचर्या मा छौ मैस्यूं, आम लोगूं फर प्रकृति का उलारौ जादा फरक नि पड़दू किलैकि वूंका वास्ता या जीवनो एक उपक्रम मात्र रैंदू।  गिरस्थी हपड़-धपड़ मा कैतें र्फुसत, सुबेर बिटे व्याखुनी तलक गिरस्थि सीं पर जुत्यां बल्द। मौळयार मधुमासौ फरक होन्दू त उलार्या जिकुड़ियूं पर, जनु कि मैत वास्ता खुदेन्दी नै-नै बिवायीं बेटी, दूर परदेस बोर्डर पर तैनात बेटुलों ब्वारी, वलि धार, पलि धार, मथि गौं, मुलि गौं ज्वान मायादार, उगैरा-उगैरा। प्रकृति का यीं उलारौ फरक चितान्द क्वासां गितैर, कवि, लिख्वार जौन, प्रकृति का यीं श्रृंगार पर गीत कविता रचण, कानी ल्योखण। भौसागर छ साब यु धरती। नाना परकार का चित्र चरेतर, ‘कै कि जिन्दगी तैली कैकी सीली’। ज्यूणा वास्ता मात्रा द्वी रुवटी का अलौ बौत्तर सालै साकम्बरी ददि तैं क्या प्रकृति क्या परिवर्तन, ‘सौणा मैना अंधा तैं सदानि धर्ती हरिं-भरिं’। 
साकम्बरी ददि कि जिन्दगी मा ज्वानी त आयी पर बसंत नि फूल्यूँ कब्बी खिलपत ह्वे। फजलै घामें कौंळी किरण आशा ल्ही त आयी पर सु आशा दुफरा चढ़चढ़ा घामें भंड़ांग मा निरपट सुखी छै। जिन्दगी लौंचि ज्वानी बिटे आज बौत्तर साल तलक चौमासै घीड़ मा जन थीड़णी रायी। अहो ! बड़ी बिदागत छन साब। किस्मत बोला चै जिन्दगी बिडम्बना, आज तक उमरौ तिहाई हिस्सौ यकुली जी वीन। नारी सत बोला चै मजबूरी पर इकुलांस कु पर्याय रयी वींकु जीवन।  
उन्नीस सालै रौंपा-धौंपा बान्द, ढै हाथै लम्बी धौंपेलि ल्ही ऐ छै स्या यीं कुड़ि पर अर आज स्यता गिण्यां चुण्यां बाबुला जन सुख्यूँ बुटुग रैगे छौ मुंड मा। माया कन पाप छौ क्या ? मायै यति बड़ी सजा भगवान द्योलो वींन सौचि नि छौ। 
आज से ठीक तिरपन साल पैलि, शिवरात्री म्यळा दिन बैरासकुण्डा गेठा मा छै स्या फुंक्याळी चदरि पैरि दगड़यो दगड़ छांछड़ी ख्यनी। 
‘छ्यम्वटों कु ठंडौ पाणि बाँजा डाळियूं कि छाया, 
किलै पौड़ि होलि लोन्डा घनघौर माया’।
चांचड़ि रंगमत मा पता नि कै दां डसाक लगिं तै मल्ला गौं परमानन्द पर पता नि चली। तै परमानन्दन आंक मा धरिं या ज्यू फर लगै कि सु ज्यू जंजाळ बणिगे। तै दिन बिटे सु हफ्ता मा द्वि-चार बार घौर-गौं, बण-बोट कखि भी चुट्यायूँ-टपकायुँ मिलण ऐ जान्दो छौ। द्वारा गातै साकम्बरी कळबळी-तळबळी ज्वानी पर सु परमानन्दन यनु मौळयूं कि भौंर जनु रिंगणू बैठयूं। दिन-ब-दिन भेंट-घाट बड़ण से आखिर दां आगा सामणी घ्यू गौळिन अर स्या बि परमानन्दै माया मा घळबट मौळेगे। अब तेरा बिगैर मि ना अर मेरा बिगैर तू ना, राजुली-मालुशाही, हीर-रांझा बणिन।
अग्ने जब ब्यौ कने बात आई त जात बिरादर बीच मा औण लगे। साकम्बरी झिंक्वाण जजमाने नौनी अर परमानन्द नोटियाळ बामण। क्या करे जौं। तबार अजक्यालों जन खुलम-खुल्ला जात बिरादरी ऐथर ब्यौ कनो समै नि छौ अर ना बिगैर जलमपत्री जुड़यां अपणा मरजी से क्वी ब्यौ कैर सकदो छौ। मर्जी कु ब्यौ मतलब भै-भयात, जात-बिरदरी नाक काटण। ये संगसार मा सब्बी चीजों इलाज छ पर नाक पर लगीं छिंछयाटौ क्वी इलाज नि। अर स्ये नाको छिंछयाट खुन्दक बणि जांद बाज-बाज मामलों मा त।  
वीं जमाना मा ब्यौ सामाजिक व्योवस्था से ही होन्द छौ, ब्वे-बुबा कि मर्जी पर। क्या अंडवाण जमानु छौ साब सु बी। लाटो-ब्यंगणों, काळौ ब्वनर्या जन बि छन जै ऊणि बुबाऽन द्येनी बाबा बोली वेखुणी रौण पड़दो अर लाटी-बैरि जैतें भी बाबा बर्ये लयूं स्या ही रखण पोड़दी। इन मा बाज-बाज त कुकर्याण भी कैर देन्दा छया। मर्द द्वी-द्वी ब्यौ त जनानी द्विघर्या तिघर्या ह्वे जान्दी छै। पर इना करम सौ मा द्वी चार यी दिखेन्दा छां बाकी त जलम-जलमौं दगड़ू, सात जलम कु साथ, एक हैका पर विस्वास, त्याग सर्मपण म्वन बचण तक। सात फ्यरौं कसम बचनो पर जिंदग्यौ बाटू। विस्वास पर बिस भी अमृत ह्वे जान्द। तब्बी त साकम्बरी ददि तै उन्नीस सालै ज्वानी बिटे आज तक एक धोकादारा नौ कि लोंग पैरी तैकि कूड़ी फर छै धुवाँ लगोणिन।
सच्च अर सत छन कि माया-मुस्क प्यार-पिरेम धरम नीती नि द्योखद। यु आदि काल बिटे जनि-तनि छ, कथा-बत्तों मा बि कति कथा इना बिजातीय पिरेम परसंग का मिलद साक्यूं बिटिन। 
साल भर लुक्का-छुपी मिलण-जुलण का बाद हैका साल वीं शिवरात्री म्यळा दिन बैरासकुण्डा गेठा बिटे परमानन्द अर साकम्बरी सट्ट उन्द भाज्यान। लोगूं का सक-सुब से बचणा वास्ता पैलि बिटे फुल फिट प्लानिंग बणे छौ द्वियूंल, यां वास्ता द्वियां अलैद बाटा हिटी सड़क तक पौंछिन। ब्यौ संस्कार कख होण छौ इना भजेड़ मायादारों कु। फेर भैर कैन पूछण छौ कि तुमारो ब्यौ हुयूँ छै कि ना ? द्वियां स्वेणि-मैंस बणि ठीक तीन साल तक रयां तै केदार घाटी तरिफां। तबार तक घौर गौं मा जति छीं-छां होण छौ सु भी खूब होयूं। उन बि यणमण्यां पातरचार बोला या मायादारों छुवीं-छाँ लोगूं का गिच्चा पर खूब रन्दन। रिस्ता बिजातीय हो त अपणि जात्या इज्जता बाना हर क्वी बसग्याळा गंडयाळा सींगा खड़ा करि देन्दू। गौं मा तौं बुढ़िळयूं कि सत अर धरम की कछड़ी पूरी नि होन्दी ज्वा अपणा छन तिघर्या किलै नि रयां हो, छी-छी कन जमानु ऐगे या! अर सु दाना बैख अपणी जात की नाक का खातिर पौंठा पळयौन्दन जोन अपणा छनि ऊँच नीच सोब कुर्चीन हो।
छुयूँ गरमा-गरमी मा जजमानल बामणों पर अर बामणोंन जजमानों पर नालिस करी। जजमानों अभ्योग छौ कि तुमुल हमारी इज्जत पर हाथ डाळी। अर बामणन बोली तुमारी स्या नौनिल हमारु गोत्र असुद्ध करियाली। अगर द्वियां गौं मा यी रैन्दा त आग जादा भड़कदी फर तौंका गौ बिटे मुख लुकौंणा वजै से सु आग कुछैक दिन मा अपणा आप स्यळैन। 
तबार तीन साल तक तै आगा फिलिंग क्या छार भी नि रायी जबारी साकम्बरी अर परमानन्द सालभरौ नौन्याळ कोळी डाळी घौर बौड़ी ऐन। परमानन्दे ब्वे ममता कु तिरस्कार नि कैर साकी, वींन खुसी-खुसी ब्वारी अर नाती तैं अंग्वाळ बोटी सांखि लगेन। हाँ नोटियाळ बिरादरिन सु मवसी अपणा भात से अलैद त करि छौ। अब द्वी मायादार अपणा नौना दगड़ गिरस्थी चलाण लग्यां। कुछैक मैना तक त साकम्बरी का ब्वे-बुबा तैं भी भारी रौंस छौ कि वींन हमारु नाक काटी पर स्याळ-न्याळ बगत दगड़ तौंका नाकौ छिंछयाट बि निमणिन। अब सु बी बार त्यवार अर चैता मैनो आळु-कल्यौ बुज्याड़ी बरोबर द्यौण लग्यान। 
द्वि साल तलक गिरस्थी ठिक-ठाक चलि पर हैका साल पिताम्बर नौकरी बाना फेर फुर्र होयूं। तबार क्या गयूँ कि आजतक बौड़ी नि ह्वेन। कुछेक साल बाद सुणण मा आयी कि तख सलाण पुन तैन डौटियाळौं मार खायी बल तौं कि नौनि चक्कर मा। फिर कुछेक साल बाद खबर आयी कि परमानन्द सिनगर गंगा पार बडियारगढ़ पट्टी मा कै बामणें बैरि नौनी मा घरजवैं रैग्यूँ बल। वा बि तब, जब गौं वळुन सु तै बैरि नौनि दगड़ पकड़यूं बल। अरे अकला ट्यौपू तति स्वाणि बांद ब्वारि छोड़ि सु बैरि मिली त्वेतैं ज्यूणू। पर अकल अर आदत कु क्या बोन्न। ‘आफूं जौं जख करम ल्ही जौं तख’। 
ऐरां ‘जब बिगड़ी बल काम तब आयी बैसाखु बाबा कु नाम’। साकम्बरी तैं तब पछतौ होयूं कि कनु गू खाई ज्वा ये ट्यौळा अर ढीला लंगोट्या पिछनै लगिं मि। परमा पिरेमी ना रूप कु रसिया लम्पट आदिम। आम द्खण मा औन्दू कि ब्यसनी को ब्यसन छूटी जान्द फर ढीलो लंगोट कु लम्पटपन नि छूटदो जिन्दगी भर। ‘कुनेथ्यूं कु कुकरम हून्दे छन एक दिन’। ‘म्यार लाटा बांगा खुट्टा राला त एक ना एक दिन भेळ पड़लो ही’। चोरीचार अर लम्पटचार द्वी इना चार छन जु एक दिन आदिम तैं अक्ष बिटे फर्स फर पटकै देन्दा। बुरा करम करि कति बि सावधनी राखा पर ‘ह्यूँ मा हग्यूँ एक दिन सै ह्वे ही जान्द’। 
ट्यौळी ट्वपली, अकल कु ट्यौपू । मास्तौ घौर मु तति स्वाणि जनानी, स्वाणु नोनु, ब्वे-बाबा दगड़ पूरो परिवार। यकुला नौना-ब्वारी घरबार। छक्की जमीन जैजाद, गाजियूँ भरियूँ गुठयार। टळटळा भौर्या नाजा कुठार। इना भवनचारी गिरस्थी कु अफिमान करि वा छन गंगल्वड़ा जनु लुड़कदो, रगड़दो, घिसदो, कुटदो घरजवैं बणिन। बल ‘घरजवैं’ ना सौरासौ ना मैतौ। जै को चूसा तैको चुर्णयां। घरजवैं ठैरो। क्वी बोलदो अजी चमोल्या जी ये काम कोरि द्या।, क्वी बोलदू चला जी दशोल्या जी तख ह्वे ऐ जावा। सर्रा गौं कु भारी-बोझ्या परमानन्द। परमानन्द छौ त नोटियाळ फर तख टीरी मा लोग वे तैैं दशोली चमोल्यौ होण सि चुगलेट मा चमोल्या जी, दशोल्या जी ही पुकारदा ही छया।
उमर सयाणी होणा दगड़ नै गिरस्थी माया मा परमानन्दन अपणी पितर कूड़ी अर बाल बच्चों तर्फा ढुंगा फरकाली छौ। कबार ज्वानी बीती कबार बुढापा ऐन पता नि चलि। तख बडयारगड़ै स्या बिचरि बैरि कज्याणन बि समै पर दुन्यां छौड़ि दिनी छै। जबार तक मनखि का खुट्टा खूब चलणा रैन्द तबार तक वेतें कै सारु-संग्ययोरै जर्वत नि होन्दी पर जब शरेल असंगळया बणि जान्द तब पौ-औलाद जर्वत नि जरुरी ह्वे जांद। पर परमा तैं बुढ़ापा मा पौ-औलादो सुख नसीब नि छौ म्येल्यौ। तख बडियारगढ़ मा तैकु एक लड़ीक अर एक नौनी ह्वेन। द्वियां समै फर बीवै बर्येन, नाती नतीणा भी खूब छया। अब बुढापा नाति-नतीणू घ्याळ मा काटणो बगत छौ पर भाग कख ल्हीगेन। पता नि नौना-ब्वारिन घौर बिटे निकाळी या अफूँ नाड़यूं भगवान जाणों, बल एक दिन बुढ्या परमानन्दन घौर बिटे अपणी फंची उच्यैन अर ठीक पौंछयूँ दिल्ली। कुछेक दिन उनि भटकणू रौ बल तख, अर आखिर दां पौंछिन एक बृद्ध आश्रम मा। 
आज तैयी बृद्ध आश्रम बिटे परमानन्दा चलि जाणें खबर भैरपन सूणी साकम्बरिन। कै हैका जगा गयूँ या मथि सच्च क्वो बतालो। स्या घंटा भर बिटे भितरे-भितर कणांट छै कनि। परामान्नदा घौर बिटे दीननौठ होणा कुछेक साल बाद सै-सौरा सुरग बासी ह्वेगे छै। यकुली मनख्याणिल जमीन-जैजाद, गाजी-बाखरी मा जनि तनि सु नौनू सुर्जमणी बारा तक पढ़ायी। नौनू भलो आंकुरी-अकलवान निकळी अर इस्कूल छौड़द यी चट फौज मा भर्ती ह्वेन। कुछेक साल तक तैकु झ्वळा तमळा खूब पणस्याई, गौं ख्वाळा मा खूब आर-सार करि। पर जनि ब्यौ करि ब्वारिल द्वार बाटो बाटू त्यारु नि होण दिनी अर फुर्र उड़िन नोना दगड़ पल्टन मा। आज तीस साल ह्वेगी यीं कूड़ी कि यकुली जग्वाळ करद। ब्वारी का उन्द जाण बगत बयालिस सालै फुंक्याळी साकम्बरी बौत्तर सालै कुबड़ी धनौळी बणिगे छै। सु सुर्जमणी फौज बिटे सुबदारी पिन्सन बी ऐगेे, कासीपुर मा मकान मालिक बि बणगे। एक ज्वान नाती एक नतीण छ। नाती-नतीण जबार तक छव्टा छया साल द्वीयेक साल मा ऐ जान्दा छां घौर। अब बड़ी पढ़ै कना बल इलै टेम नि होणू। सुर्जमणिन बाळापना होस हवास मा औणा पर जब अपणा बाबै कानि सूणी त सु सरम का मारि हट ह्वेन अर तेन तै बुबा तैं तैका करम अर अपणि जिन्दगी तैं अपणा करम पर रखण छोड़िन इलै तेन बुबा परमानन्द तैं कब्बी याद नि करि। क्वी पूछदू तेरु बुबा कख त सु जबाब देन्दू मौरिगे। 
क्वारा नाज अर ज्यून्दा मनखी कति परकार होन्दन साब। चलो परमानन्द टयौळि-ट्वपलि रयूँ तब तैकी तति गत्ति-पत्ति ह्वेन, पर साकम्बरी ददि कु त तै ज्वानि बिटे आज तक एकी परकार रयूं अर वा परकार छौ, तिसाळी मायादार, अतृप्त सुवागिण। सु परमा दगड़ ज्वानी उमाळ मा नि भाजि छै बल्कि पिरेमों एक स्वाणु घौर बसाणू भाजि छै, जख भैर भितर पिरेमों बथौं हो, पिरेमों आसण-बासण हो। जिन्दगी भर परमा दगड़ एक गळज्यू घुघती बणि घुराणी रैली, पर ऐरां कैन सोचि छौ कि चौबीस साल मा ही तळबळी ज्वानी सूखी जाली एक धोकादार मनखी पल्ला पकड़ि। बल ‘जात कु घोड़ू औलाद कु बछरु’, तै सुर्जमणी वास्ता सर्रि ज्वानी घिसीं, पस्यौ का छीड़ा बगायी पर तैन बि ‘अछैला घामौ तौ’ ही दिनी। अरे ब्वारी सब्यूं कि ऐन, भैर बि सब्बी बसणा, पर तेरा जन अपीड़ क्वी-क्वी होन्दू, तिन खर्चा पाणि द्ये मेरि तिसळि मायै तीस बुथ्याणे कोसिस त करि पर तू कब्बी यीं ब्वे धौरा नि आयी जिन्दगी भर।  
बाप-ब्यटा जति निठुर ह्वेन स्या वति जिदेर। वींन सती सावित्री अर अनुसुया कु बाटू नि छोड़ी। पूरा जीवन भले भितर बिटे कड़ाणी रयी पर भैर ऐंऽ नि ओण दिनी।
आज जै परमानन्दा नौ कि नाक मा लोंग पैरि शरेल स्यूं सुहाग छाला जाणू त्यार छौ होयूँ तैका छाला पौंछणें खबर सूणी स्य छटपटाण छै लगि। घंटा भर तक तै अडासा पर बेसुद सकस्यांदी स्या अचाणचक उतळी ह्वे चिल्लाण लगि। ऐ रे मंसाराम ! ऐ भाट, ऐ मंसा। कख गयूँ रे सु परमानन्द ? ऐ कख गयूँ रे वा धौकादार ? सच्ची चलिग्ये सु भगवान मु। अरे बांमण उन्द चुट्यै द्यूँ रे यीं नाकै लोंग ? बोल चुटयै द्यूं ? साकम्बरी ददि पागल जनि भट्याण लेगे, पछाड़ खै डाड मना दगड़ वींन चट्ट.... रुंगड़ि स्ये नाकै लोंग अर उन्द चुट्यै दिनी। रून्दी रून्दी अफूं तै बोन्न लगि अरे साकम्बरी उन त तिन सारो जीवन विधवा जन काटि पर आज तू सचिगे विधवा ह्ेगी रे !! विधवा .... । 
ऐरां भगवान आज वीं तिसाळी मायादार, अतृप्त सुवागिणें डाड सुणण वळू क्वी नि छौ तख नजीक ज्वा वींकु कणाट सूणी द्वी बचन अपण्यांसा बोली देन्दो।   कथाकार : बलबीर राणा ‘अडिग’


Friday, 19 September 2025

बादळ हरामी साला : मनहरण घनाक्षरी

 बादळ हरामी साला, धौळा-धौळा काळा-काळा,

काल बणि औणा बोला, फटणा फटाक चा।

होणु-खाणु घर-बार, मिलट मा वार-पार,

डुकरदा रोला-गाड़, कना सफाचट चा।


सर्ग बण्यूं भौंकाल, डौरौ नौ बसग्याळ,

जान ऐगे गाळ-गाळ, कनु कलो-काल चा।

जंत जोड़ जौंतैं पाळि, दबेणि सु गाजी साळी,

हैंसदि जिंदगी होंणि, पल मा मड़ान चा।


हिलणि पाड़ै कि जड़, भर्र-भर्र धड़-धड़

सड़क्यूँ कि चीरफाड़, कनि या बरखा चा

विकास बिणास होंणू, पाड़ रुणू दणमण,

राजी-बाजी घौर-कूड़ि, होणी खंद्वार चा।


Tuesday, 16 September 2025

ननि कहानि : यु बि विशुद्ध लोकवाणी ही छ



 ब्वेकु बौं हाथन पाँचेक सालै श्रेया कु बस्ता छौ कांधिम थाम्यूं अर देणा हाथन वींकि हथगुळि पकड़ी नौन्याळां तै भिड़कतौळ मा छै वींतैं अग्नै खेंचणि, अर स्या खुनखुन करि पिछनै छै ताण मारणी। वींकु हैंका तरिफां ताण मन्नो कारण छौ इस्कोला गेटा बौं तरिफां बाळों कि चटण-बटण वळि दुकनि।

चुप्प रा गौ खड्यौण्यां, चल अग्नै ? मैने तेरो को फुंड चुट्याणा आज।

वीन खुन्न-खुनाट दगड़ बोलि "अपणि बाबै ....... होगी तू " मुझे चौकलेट नै लाणै देती है। ब्वेल चट्टाक वींका गिच्चा पर। कैसी गळद्यवा लड़की है ये ? पता नै काँ-काँ से सीखती है ऐसी भद्दी गाळयां। यां सैर-बजार में रै कर तमीज बि नै सीख रयी। जनु कि सैर-बजार होन्दू ही तमीजा वास्ता होलू।

चल घर, तेरे पापा को तेरी सिखैत करूंगी आज।

ऊँऽऽ..हुँ...हुँ, हाँ…. कल देणा, उस पापा ने ही दिले थे मुझे पांच लुप्या, ऊँऽऽ हुँ.. हुँ ।

अच्छा त सु कमिना बिगाड़ रा मेरी श्रेया को, बतौन्दि वेतैं आज ।

 ‘जन मयेड़ि तनि जयेड़ि’ श्रेया कख चुप्प रौण वळि छै। वीन बि टप्प उनि खुन-खुनाट दगड़ ऊँऽऽ..ऊँऽ... मैने बि बता देणा कि पापा ये मम्मी तुझे कमिना बोल रयी थी अर ब्याळि बगल वाले अंकल को "अपणि मयेड़ी ख....." बोल रयी थी।

मि वूंका पिछने-पिछने छौ औणू तै पतळी गळि मा। तौंकि विशुद्ध लोकवाणि वार्ता सूणि मितैं खित्त हैंसि ऐन अर मि तौं तैं बिरै अग्नै सरक्यूं। मेरा अग्नै सरकण पर स्या भुलि गुणमणाट मा छै बौन्नी, आँ ऐसे हंसणें वाले तो देते हैं बच्चों को कुशिक्षा।

@ बलबीर राणा 'अडिग'

Wednesday, 20 August 2025

न कैकि भै, ना डौर छ,



न कैकि भै, ना डौर छ,
च्वोरुं बस्ती मा घौर छ।

तैन क्या बतौण सुबाटू,
ज्व अफूँ ही लन्यौर छ।

घिस्वों जुबानों क्या बोन्न,
तौंकु न ठिकौण ना ठौर छ।

बल, कितुलौ मरयूँ गुरौ देखि,
या ताण-पराणे सिक्कासौर छ।

भिज्याँ पांजी कख ल्ही जैलो,
सब्बि यख द्वी दिना खन्यौर छ।

बगतै चाल बगत पर बींग अडिग,
नित ह्वे जालि सब्यौरै अब्यौर छ।

शब्दार्थ :--

लन्यौर = लिंडेर
खन्यौर = खाण वळा, मेमान
सब्यौर = सै बगत
अब्यौर = देर, लेट

20 अगस्त 25

Tuesday, 5 August 2025

कुयेड़ी तू घौ ना लगौ





कुयेड़ी तू घौ ना लगौ
बर्खा तू कब्बी ना ओ
इनमण्याँ निराशपंथ कनू
बतौ हम जौ त कख जौ।

पैल्यौ दियूँ नि मोळणू
तू फेर ठसाक लगाणू
जख तेरि मर्जी औणि
तख बम बणि फूटणू।

अरे किलै छ त्वे कौ-बौ
कुयेड़ी तू घौ ना लगौ

हैंसदू खेलदू जीवन उजाड़ी
तेरा हिस्सा मा क्या जि आयी
किलै तू काल-बिकराल होयूँ
यनु तैस-नैस करि तिन क्या पाई।

माटा मा मिलगे मौ कि मौ
कुयेड़ी तू घौ ना लगौ

यीं त्रासदी कु जबाब क्वो द्यूलू
विकास तू द्येलू या सु मथि वळू
केदार, हर्षिल, थरळि, धराली
भोळ न जाण कैकु नंबर ऐलू।

ज्यूँदी धर्ती बिणास ना लौ
कुयेड़ी तू घौ ना लगौ

@ अडिग 
5 अगस्त 2025 धराली हर्षिल त्रासदी पर 

Friday, 1 August 2025

दोहावली : चुनौ

गजेसिंग जी जेठो भै, कणसु फतेसिंग दाणि।
चुनौ मा हुयाँ विरोधी, द्वियूँ  कि अलैद बाणि।।

चुनौ भी क्या नि करांदो, भयूँ आग-दर-भ्योट।
एक कलम दवातन मनू, हैकु कुल्याड़ै चोट।।

फतेसिंगै चिफळी बाणि, गजेसिंगै सुद्दि स्यांणि।
फतेसिंगा मन मा क्या च, गजेसिंगन क्या जाणि।।

हैंकै लकीर छव्टि कनू, ख्यौलणा गलत चाल।
वोट द्योणान फते उणि, गजे कु सुतणा माल।।

हैंका काँधिम ताणि कन, बणणा निशाण बाज।
अपण कन्धा राखा बल,  चल्लो बंदुकि राज।।

जु फतेसिंगन खायी घी, गजे किलै ब्यमळाणु।
अपणू हाथ सूंघे किन, क्या छ बिंगाण चाणु।।

चुनौ ना चकरपति ह्वेन, वोटरों खिंचम-खींच।
जु बगाणू दारू सारु, आखिर जितणो वी च।।

गजे भै कबार बिंगलो, तै फतेसिंगै चाल।
दारु-मासु मा वोट दे, रौण तेरा तनि हाल।।


@ बलबीर राणा 'अडिग'
ग्वाड़ मटई बैरासकुण्ड चमोली 

Thursday, 17 July 2025

दगड़यूळ




चांचड़ि झुमैले अंग्वाळ होंद दगड़यूळ, 
चौंफुला कि ताल-चाल होंद दगड़यूळ।

जागरि का भंयौर, कथा का हुंगरा,
ढोल-दमुवे साजि ताल होंद दगड़यूळ। 

नि होन्द दगड़यौं मा क्वी छ्वटू बड़ौ, 
एक हैकू ऐसास ख्याल होंद दगड़यूळ।

साजि उच्छयाद अर साजि हैंसा-रौळि, 
बाळों जनु घपरौळ घ्याळ होंद दगड़यूळ।

खट्टू तीखौ तिता से भैर आयूं ज्वा,
वीं पक्यां आमै मिठ्ठास होंद दगड़यूळ। 

ठौल-ठौल निभाणें खानापूर्ति ना अडिग,
करिजों मा बजदि धुंयाळ होंद दगड़यूळ।


@ Adig

16 Jul 25

Friday, 11 July 2025

चुनौ चुनौती

 


चुनौ चुनौती च, समझदरि  से काम कन,
हैकाऽ ना अपणा मर्जिल मतदान  कन ।

आपौ वोट अमोल च गौं भबिस्या वास्ता,
इलै सोचि-बिचरि अपणा वोटौ दान कन ।  

अजाणन त  जिती बि अजाण  ही  रौण,
जणगुरु तैं  वोट  द्ये गौंऽको उथान कन।

वेकि  योग्यतै  परख  तुमरि  योग्यता च,
इलै योग्य  तैं  चुनी  योग्यतौ  काम कन।

दारू-मासू  अर  द्वी  पैंसा  मा  बिकण,
छ  यनु  काम  लोकतन्त्रौ  अपमान कन।

जात-बिरदरि, ख्वाळा,  भै-भयात  से  भैर
काबिल  कंडीडेट तैं  ही  समर्थवान  कन।

सुद्दी  बखौंण मा वोट नि चुट्याण  अडिग,
बींगी-भाली ग्राम समृद्धी वास्ता श्रमदान कन।

रचना - बलबीर राणा ‘अडिग’

Saturday, 3 May 2025

गढ़वळि फिल्म "खोळी का गणेश”



सबसि पैलि त ‘खोळी का गणेश’ फिलमै सर्री टीम तैं बधै अर शुभकामना देन्दू कि आपक श्रम साध्यन एक भलि फिल्म गढ़वळि सिनेमा मा दीनि। भौत सालों बिटे एक भलि फिलम द्योखणू मिली। अजक्याल या फिलम राज्य अर देसै राजधानी दगड़ हौरि जगा बि खूब चर्चा मा छ। फिलमों मतलब केवल मनोरंजन ना बल्कि सिनेमा चरित्र का अनुरूप चारित्रिक गुणों मा सबल अर अब्बल होण होंद, अर इना गुण यीं फिलम मा लोग देखणा। विशेषकर कथा विषै अर निर्देशन। पटकथा एक ज्वलंत सामजिक विषै पर छ अर डारेक्शन मा धीर र्धिघम यानि परिपक्वता छ। फिलम ब्वाला त घरजवैं, चक्रचाळ, बंटवारू, औंसी कि रात, जना भलि गढ़वळि फिलमौं का दगड़ छ। यनु पुळबैं केवल मि ही ना बल्कि कतिगा देखदारों का मुख सि सुणेणू। एक-एक करि फिल्म का सब्बी पक्षों कि छाळ-छांट कने कोसिस कनू। उन मि एक कवि अर कथाकार छौं फिल्म समिक्षक ना, फिर कोसिस कनू। 

पैलि बात - या बात केवल ‘खोळी का गणेश’ फिलम ना बल्कि पूरा गढ़वळि सिनेमा जगत का वास्ता छ। त यीं बात पर मि फिलम का टैटल पर औन्दू, फिलम को टैटल छ ‘खोली का गणेश’ मि आप अर आम गढ़वळि लोक उच्चारण कनू ‘खोळी का गणेश’। त ‘ल’ अर ‘ळ’ द्वी शब्दों कि छाळ-छांट इनि चा कि हमारि गढ़वळि मा द्वीयूं अर्थ अलैद होंद। गढ़वळि मा ‘ल’ कि जगा पर य उक्षिप्त परिवेष्टित ‘ळ’ को प्रयोग होंद। यांकि पूरी व्याख्या कन यख गलत ह्वे जाली। मोटु-माटी देखा त अगर हम ‘ळ’ कि जगा ‘ल’ ल्यौखला त हमरि गढ़वळि मा शब्दों कु अर्थ बिल्कुल बदलि जांद। जनु कि ‘खाल’ मतलब चमड़ा, अर ‘खाळ’ मतलब तलौ या तालाब, ‘छाला कु मतलब नदी या गदेरौ कु किनारा, अर छाळा कु मतलब फफोला या छाले’। मोल - कीमत, अर मोळ - गौबर। यनु उच्चारण विभेद ‘ण’ का जगा ‘न’ मा बि दिखदो, जनु कि विणाश - विनाश, कठिण - कठिन, पाणी तैं पानी इत्यादी। त माराज अपणि पीढ़ी का वास्ता भाषा कु सही उच्चारण रूप अर उपयोग पौंछाण साहित्य अर संस्कृति वर्ग का का सब्बी लोगों कि जिम्मेदरि होन्दि, कोसिस चयेंद कि लोक की असली पछयाण बची रावो।

अब इखमु देखा कि अगर क्वी एक्टर व्यवहारिक रूप से गढ़वळि नि बच्यान्दो अर जब वेतैं हम स्क्रिप्ट मा यनु लेखि द्याला त सु संवाद ‘ल’ जनु करलो ज्यां सि वेकु उच्चारण गलत होलू, अर भाषा बनौटी अर थर्पीं जन लगलि, बिल्कुल रोबोटिक। इलै वे कलाकार तैं बिंगांण पड़लो कि भै साब, मेला कु मतलब बीज होन्दू अर मेळा कु कौथिग। जनु कि चला भै म्यौळा जंयोला आज। यख बि ‘खोली’ कु मतलब खोलण यानि खोलना होणू। जनु कि, खोली दे माता खोल भवानी धारै मा किवाड़ा (एक लोक गीत)। ये कारण ‘ळ’ पर बात रखण जरूरी समझी। 

या बात आज ना बल्कि गढ़वळि सिनेमा का उत्रार्ध बिटे देखणू मिलद। भाषा सही लिखे जावो अर सही उच्चारित हो या जिम्मेवारी फिल्म संबन्धित सब्बी किरदारों कि होन्दि। स्क्रिप्ट राईटर, डारेक्टर, एक्टर अर मददगारी, यामा सब्बी सामिल छन। यीं बात तैं मि केवल यीं फिलम का बाबत नि बल्कि आज पूरा गढ़वळि सिनेमा जगत का परिप्रेक्ष्य मा बोन्नू। अगर हम भाषा संस्कृति बचाणैं बात कना त यखमु या बात झूटि ह्वे जाणि, अगर केवल मनोरंजन अर अपणू व्यवसाय देखण त फेर बात अलैद छ। भाषा बाबत हौरि कारकों का अलौ सबसि बड़ौ कारक मितैं जु दिखद वा छ हिन्दी का चश्मा से गढ़वळि ल्यौखण अर बोन्न। आशा च मेरि यीं बात तैं फिल्मकार अन्यथा नि ल्हेल्या अर अग्नै अपणि भाषा वास्ता सुधारौ बाटू द्यखला। 

दूसरी बात - कि ‘खोळी का गणेश’ एक सफल फिलम (फिल्म का जगा ‘फिलम’ गढ़वळि उच्चारण) छ। क्वी बि फिलम भलि या खराब फिलम निर्माता, निर्देशक, कलाकारों या हौरि सायक टीम से ना बल्कि दर्शक से होन्दि, टीम त अपणू सौ प्रतिशत लगान्द, अपणों नौ गुय्या रखण क्वी नि चान्दो। फेर बि पूरि कोसिस कना का बाद कुछ इना चीज छूटी जांद ज्वा दर्शकों पर छाप नि छोड़ि सकद। सब्बी एंगलों बिटी देखा त ‘खोळी का गणेश’ फिलमन दर्शकों मा छाप बि छोड़णिन अर वे मिथक तैं बि तोड़णिन ज्व आम लोग बोल्दन कि गढ़वळि फिलम मा क्या रख्यूँ छ ? 

तिसरि बात - पटकथा लेखन, संवाद अर निर्देशन, या तिन्यां चीज श्रियुत अविनाश ध्यानी जिका खाता मा जांद, ध्यानीजि युवा फिल्मकार छन। स्क्रिप्ट लेखन, निर्देशन का अलौ वा एक बड़िया अभिनेता बि छन, जनुकि मिन मथि बोलि कि फिल्मै पटकथा हमारा समाज मा साख्यूँ बिटे चलणि छूवा छूतै कुप्रथा पर छ, यनु संवेदनशील विषै रखि निर्देशकन भौत बड़ि जिम्मेदरि निभैन। फिल्म मा संवाद सटीक अर विषय अनुगत छन, संवाद सुद्दी लम्बा नि खिंच्या। यांका अलौ कैमरा एंगल, शौट, विजुअल इस्टेल, लोकेशन जगा, सेट डिजेन अर संपादन मा बड़िया काम होयूं, ये पर जादा बात कने मेरि जानकारी कम छ। हाँ फिलमै भावना अर सामजिक रैबार समाज तलक पौंछाण मा डारेक्टर सफल से बि उपर छ। 

चौथी बात कलाकार - फिलम का लीड कलाकारों मा अभिनेता शुभम सेमवाल अर अभिनेत्री सुरुचि सकलानी अपणा अभिनै का पैला पैदान मा होण पर बि यनु नि लगद कि स्ये नवाण छ। अर द्वीयून अपणा अभिनै से या बात साबित करियाली कि स्ये लीड रौल मा कै बि फिलम तैं सफल बणैं सकदन। दगड़ मा अज्यूं भौत कुछ सीखणैं जरोरत छ, बड़ौ कलाकार बणणे जात्रा सतत जारी रन्दिन। संजय मिश्रा बणण मा बगत लगद। द्वी नौन्याळौं तै अग्नै वास्ता शुभाशीष।  

अगर सह कलाकरों कि बात करे जाओ त भैजी गोकुल पंवार जी जना लोक का ऐन-सेन एक्टर दगड़ विनय जोशी कि दीपक दगड़ बड़िया जोड़ी, सुशील रनाकोटी, अरविंद पंवार, रश्मि नोटियाल, दिव्यांशी कुमोला, राजेश नोगाई दगड़ सब्बी कलाकारों कु बड़िया नापि-तौल्यूं अभिनै छ। हाँ यख बि कुछेक कलाकरों कु संवाद उच्चारण विभेद लगि, किलै कि कति जगा तौंकु लिंगीय संवाद मा संबोधन गलत होणू, ह्वे सकद स्ये बि व्यवहारिक हिन्दी परिवेश से होला यांमा वूंकु दोष नि, पर औण वळा टेम पर यीं बात तैं याद रखला त अपणा व्यौहार मा गढ़वळि रखि आप बि दीपक रावत जना दमदार अभिनै कोरि सकदन। 

अब बात करला यीं फिलम का सबसे सशक्त एक्टर दरवान दास, दीपक रावत जिकी जोन अपणि दमदार एक्टिंगै छाप देखदारों पर छोड़ि। पता नि सु मनखि आज तक कख लुक्यूं छौ या मि ही लिक्यूं रयूं, खैर मि त लुक्यूं ही छौ पर इनै-उनै की त सूणि जांदू छौ तौं बौडरों पर। अविनाश ध्यानी जितैं साधुवाद, आपक धौर बिटे दरवान दास एक यादगार भूमिका बणगे। दीपक का सद्यां अभिनै का वास्ता शब्द कम पड़णा। येकु एक मुख्य कारण यु बि छ कि कलाकार विशुद्ध व्यौवारिक गढ़वळि परिवेश बिटे छ, इलै वेतैं संवाद का अनुरूप ढळण मा जादा मीनत नि कन पड़ि होली । जति बगत अर मीनत हौरि कलाकार संवाद बींगण मा लगांद तति मा विशुद्ध लोक कलाकर अपणि एक्टिंग तै सुधारी देन्दू। या बात सब्बि कलाकरों तैं टक लगै कि बींगण जरूरी छ। 

अग्नै बात करे जावो गीतकारै त विनय जोशी जिन बड़िया गीत लेखिन अर वूंतैं आधुनिक संगीत मा ढाळी अमित बी कपूरन वर्तमान लेक बणाई। हाँ क्वी गीत लंबा समै तलक हमारा लोक मा बजणू रैलू अर लोक का कंठो मा आणू रैलू इनि सम्भावना कमति लगणी। कालजयी गीत बणाण अर होण अफूं मा एक बड़ौ संघर्ष होन्द, या बात हमारा गढ़रत्न नरेन्द्र सिंह नेगी जी मु जै कि सीखण पड़ली।  

अग्नै बात सिनेमेटोग्राफी की त उत्तराखण्डी फिल्मों मा यनु काम कम ही देखणू मिली आज तलक, यीं फिलमै सिनेमेटोग्राफी उत्तराखण्डी सिनेमा का भविष्य वास्ता शुभ संकेत छ कि फिल्मकार यीं बात पर अब बड़िया फोकस कना। अर करदा बि किलै नि जब इतगा बड़िया साज-बाज मैजूद हो, बगत का दगड़ बोगण जरूरत बि होन्दि अर जरूरी बि। 

आखिर मा निर्देशक अर लेखक अविनाश ध्यानी मु काम कनो बड़िया अनुभौ छ या बात यीं फिलम मा देखणू मिलद। बिजातीय प्रेम कथा एक जटिल विषै छौ, यु विषै आपन समाज मा रखी बड़ी हिम्मत दिखै। फिर एक दां पूरी फिल्म कुटुम्बदरि तैं बधै अर साधुवाद। 


 @ बलबीर राणा ‘अडिग’

Thursday, 3 April 2025

क्यू.आर कोड युक्त "मि गढ़वाळी छौं" पोथी कु लोकार्पण

 




क्यू.आर कोड युक्त "मि गढ़वाळी छौं"  पोथी कु लोकार्पण गढ़वाल रैफल रेजिमेंटल सेंटर लैंसडाउन (काळू डांडा) मा सफल ह्वे।
एक लपाग अपणि भाषा का खातर रेजिमेंट सेंटर का कमांडांट ब्रिगेडियर विनोद सिंह नेगी' विशिष्ट सेवा मेडल, जिकी या सराहनीय पहल स्तुत्य छ। यीं पोथी का प्रधान संपादक लेफ्टिनेंट कर्नल देवशीष मुख़र्जी अर संपादकीय टीमन अपणा अथक प्रयास सि कम समै मा यु भगीरथ काम करे।
पुस्तक संपादकीय टीम मा श्रीमती भगवती सिंह (प्रधानाचार्य), श्रीमती मीना अधिकारी अध्यापिका,  जी. जी. आई. सी. लैंसडाउन, सूबेदार बलबीर सिंह राणा (रिटायर्ड) अर गढ़वाल रेजिमेंट सेंटर का सूबेदार संतोष कुकरेती अर वूंका दगड़ तकनिकी काबिल टीमन ये यज्ञ तैं पूरो करि। उन त सम्पदाकीय टीमल अपणि तरिफाँ बिटि पूरी कोसिस करि कि क्वी कमि न रै जावो पर साधारण रूप से एक छ्वटि सि किताब मा इतगा बडू लोक नि समै सकदू छौ इनु बि ध्यान राखि। पोथी गढ़वाळ रैफल मा गढ़वळी का अलौ देश का हौरि भाषा परिवेश का ऑफिसर, जेसीओ, जवानों अर वूंका परिवारों तैं सरलता सि गढ़वळीपन बिंगाण लेख बणायेगे जैमा चौदह अध्यायों मा आम गढ़वाळी व्यवहारिक शब्दावली, आणा-पखाणा, प्रशिद्ध गीत अर गीतकार, प्रशिद्ध गढ़वली फ़िल्म, चित्र का दगड़ पारंपरिक वाद्ययंत्र, नृत्य, संस्कृति, रीति-रिवाज, रहन-सहन, भेष-भूष, बार-त्यौहार, थौळ-कौथिग, उपकरण, भोजन-व्यंजन, फल-पुष्प, साग-भुज्जी, पशु-पक्षी, चार धामों सहित लगभग पूरा गढ़वळी लोक जीवन तैं संक्षिप्त रूप मा समाहित करयूँ।
अर पोथी कि विशेष विशेषता या छ कि हर अध्याय अर हैडिंग मा क्यू आर कोड दियूं जैतैं स्कैन करि पाठक वे चैप्टर अर तथ्य की सम्पूर्ण जानकारी इंटरनेट शोर्ष से पढ़ी, सूणी अर जाणी सकदन। पोथी कै बड़ा प्रकाशन से प्रकाशित नि छ बल्कि गढ़वाळ रैफल रेजिमेंटल सेंटर कु अपणु प्रकाशन छ जैतैं सेंटर की प्रिंटिंग प्रेस बिटि छपवैगे।
पोथी का आमुख उद्बोधन मा गढ़वाल रैफल रेजिमेंट का कर्नल ऑफ़ रेजिमेंट अर उप थल सेनाध्यक्ष "लेफ्टिनेंट जनरल एन.एस राजा सुब्रमणी' पीवीएसएम, एवीएसएम, एस एम, वीएसएम" अर सेंटर कमांडांट "ब्रिगेडियर विनोद सिंह नेगी, वीएसएम," जिको छन, सम्पदाकीय प्राक्कथन लेफ्टिनेंट कर्नल देवाशीष मुख़र्जी जिको लिख्यूँ छ।
हैकि विशेष बात या छ कि सम्पदाकीय टीम तैं पोथी गंठयाणों मूल शोर्स "उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय हल्द्वानी गढ़वाली पाठ्यक्रम" ज्व हमारा लोक का लब्ध प्रतिष्ठित साहित्य अर भाषावि जनों कु संपादन छ, अर भाषाविद श्री रमाकांत बेंजवाल कृत "गढ़वाली भाषा की शब्द सम्पदा" पोथी रै। इलै पोथी मा मानक गढ़वाळी भाषौ इस्तेमाल होयूँ, व्याकरण आम पाठक सम्मत छ। पोथी मा व्यवहारिक शब्द अर बाकी तथ्यों तैं हिंदी मा व्याख्यायित करयूँ ताकि आम गढ़वळी जवान अर देशा हौर भाषी ऑफिसर अर जवान आसानी सि समझि साको।
आशा ही ना बल्कि परम विस्वास छ कि या पोथी फ़ौज मा बि गढ़वाळी भाषा संवर्धन अर अपणि भाषा अपणि पछयाण वास्ता  कारगर साबित होली।
समारोह "रैफलमेन सुरजन सिंह शौर्य चक्र" ऑडोटोरियम मा ह्वे जैमा मुख्य अथिति सेंटर कमांडांट ब्रिगेडियर विनोद सिंह नेगी' वीएसएम, का अलौ पुस्तक सम्पदाकीय टीम,  रेजिमेंट सेंटर का तमाम ऑफिसर, जेसीओ, जवान, अध्यक्ष सैनिक कल्याण बोर्ड लैंसडोन, पुलिस एसएचओ लैंसडोन अर मिडिया बन्धुओं की गरमामयी मैजूदगी रै।

@ बलबीर राणा 'अडिग'

Thursday, 13 March 2025

हौरी गीत

https://youtu.be/xKaAnrJDYqE?si=xR5nyb9_dqMr5sYI 

आयौ रे फागुण मैना,

वसंत बहार।

आवा दगड़यौ नाचा गावा ,

हौरी को त्यौवार।


म्वारी भौंरा गीत गाणा 

फूलौं-फूलौं पात 

सारियूँ खिलीं पिंगळी लयाँ 

हैंसदी फ्यौँली पाख 

बणों मा बुराँस हैंसणू 

हैंसणी डांडी धार। 2


आयौ रे फागुण मैना,

वसंत बहार।

आवा दगड़यौ नाचा गावा ,

हौरी को त्यौवार।


ढोल बाजौ दमुवा बाजी 

हुड़का ढोलकी ताळ 

नचा-नाची भैर भितर 

ज्वानों को उछयाद 

रंगौं मा यी खाणि-पीणी 

रंगौ को सिंगार।


आयौ रे फागुण मैना,

वसंत बहार।

आवा दगड़यौ नाचा गावा,

हौरी को त्यौवार।


दाना संयाणा रंगमत 

बाळा खेलवार 

हौळयारौ की डार ऐगे 

खौळा अर तिबार 

साज-बाज सजिगेनी 

सजीगे पैरवार।


आयौ रे फागुण मैना,

वसंत बहार।

आवा दगड़यौ नाचा गावा,

हौरी को त्यौवार।


थौ बिसौंला काम-धाणी  

बिसौंला खुद पराज 

मेरु-तेरु तब ह्वे जैलो 

गौळा भिंटोला आज 

झिट घड़ी रंगमत रौला 

रंगिलौ छ दिनबार।


आयौ रे फागुण मैना,

वसंत बहार।

आवा दगड़यौ नाचा गावा,

हौरी को त्यौवार।


@ बलबीर राणा 'अडिग'

Monday, 17 February 2025

जबार तू बूढळी ह्वे जालि: आयरिश कवि विलियम बटलर येट्स की कविता When You Are Old कु ग़ढ़वळी अनुवाद

 


जबार तू बुढ़ळी
ह्ववे जालि
पक्यां लटुला
डगमगकार सुफ़ेद मुंडी ल्हि
चुलाण सामणि बैठिं
उनिंदि ऊँगणि होली
तबार
यीं किताब थैं
उठै लियां
अर सौजि-सौजि पौढ़ी लियां
अर
सुपन्यां देख्याँ
वीं कौंळी स्वाणिलि नजर को
ज्व कब्बि तेरि आंख्यूं मा छौ
वीं नजरै गैरै बारा मा सोच्याँ
जै गैरै मा कति ज्वान ज्यू डुबिन हो
कति लोगोंन पिरेम करि हो
तेरा स्ये मनमौण्यां बगत दगड़
अर
झूट्टा या सच्चा पिरेम से
चैन हो तेरि सुंदरता थैं।
पर
एक आदिम छौ
जैन पिरेम करि
तेरा भितरै पावन आत्मा दगड़
बगतै भताक खांदि
बदलेणि तेरि मुखड़ी पीड़ा दगड़
अर
जबार तू तै आगै झौळ मा
पढ़णू झुकलि
तबार तू
जरा उदास ह्वे बड़बड़ालि
कि ऐरां दा
पिरेम बि कनु भाजिगे
दूर काँठियूं चुळख़्यूं पर
अर गैणा भीड़ मा
वीन अपणि मुखड़ि छिपैली

अनुवाद : बलबीर सिंह राणा 'अडिग'