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Thursday, 15 October 2026

ऊँ दगड़ भेट घाट करि औं


कोसिस करदूं

कि! बगत बगत पर 

ऊँ दगड़ भेट-घाट करि औं

ज्व नि ऐ सकदन

मिमा भेटणू  सैर मा।


पाखौं मा मुळ हैंसदि फ्यूंली 

बणों मा खिखताट कर्दा बुराँस

झपन्याळा बाँज, 

ऊँचा लम्बा तड़तड़ा देवदार

मखमली बुग्याळ, 

नौळा-मंगरौं कु ठंडू पाणी

 छीड़ा-छंछरा गाड़-गदनौ कु सुंस्याट

अर......,

चम्म चमकदी ह्यूँ चुळिख्यूँ चळक्वाट।


मिली कि ऐ जौं 

नि छ जौं मा घड़ेक थौ टेकणू बगत

जु रिंगणा रन्दन गिरस्थी ओर-पोर 


घासा सुयटा तौळ पस्यौ मा लरतर्र बोजि

चुल्ला-चौक, कुटण-पिसण मा रिटदी दादी

तिर्रवाळ ढिस्वाळ मेसि पर हैळ लगान्दू भैजी

ब्यखुन्दा तासों मा मस्त काका-बौडा।


सेवा लगै औं

वूं तैं ज्व छन हमरि रीती-रिवाज 

धरम-संस्कृत्यै पछयाण 

द्यो थानो का नीज-निसाण

धुयांळ देंदा ढोल-दमुवा 

मडाणों का पश्वा-डंकरि

डौंर-थाळि, हुड़का पर धौंस्या-जगरि

चाँचड़ी-चौंफुला ख्यलवार

ख्यौळा-म्यळों का हुळयार।


भिटवळि लगौं ऊँ दगड़ 

जौंका हौंस-उलार दगड़

बाळौपन खिलपत खिल्यूँ 


गुणी-बांदर, घ्वीड़-काखड़

खुदेड़ हिलांस, 

मयळि घुघती

छिंज्याट्या सिंटुला

मेलख़्वार घिंदुड़याँ।


पर! कब्बी कब्बी 

सब्बि जतन अर कोसिस 

बगतै भताग खान्दी 

सैरों सैणि गळयूँ मा गुर्ती जांद

अर, मेरि खुद /आसा 

दौड़दी गाड़ियाँ, 

भगदा मनख्यूँ का 

भिभड़ाट मा भरमे जांद।


15/10/25

@बलबीर राणा 'अडिग'

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