धर्ती पर जीवन संघर्षों वास्ता च, आराम त यख बटिन जाणा बाद, ना चै किन बी कन पड़ल, ये वास्ता लग्यां रावा, जत्गा देह घिस्येली उत्गा चमक, उत्गा संचय जु यख छुटलू। @ बलबीर राणा 'अडिग'
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Sunday, 25 January 2026
मनहरण घनाक्षरी
हरि-भरि डांडी कांठी, हियूँल ढकिन चांठी,
संगता सुफेदी जांठी,धर्ती बणि स्वाणि चा।
जड्डू-जुड्डू ठंडू-मंडु, कौंपि-कूंपि लगि रन्दि,
जीवन जतन गाणि, काम-काजै स्याणी चा।
डाळि बोटि झकमक, पौन पंछी रक-बक,
बोन्ना हम जौऊं कख, असन आतुरी चा।
मनख्यूं कि आग साग, खंतड़ा मंतड़ा राग,
गाजि -मूजि बिचरों थैं, झड़ द्यो यु भारी चा।
बुढया बिराळा जाता, दिन-रात आग तापा,
तति मा बि झझराटा, कुच्यां रंदा चुल्ला चा।
बाळा भगवान रंदा, नंगा धंगा चंगा होंदा,
जड्डू यूँ कु ढूँगा मांग, होंदा बाळा ठुला चा।
@ बलबीर राणा 'अडिग'
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